शनिवार, 17 जनवरी 2026

कविता: "कोहरे ठंडी की"

"कोहरे ठंडी की"
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है।  
कोहरो की भरमार रहती है।
मौसम थोडा भीगा रहता है। 
 कभी धूप खिल जाता है। 
शाम को जल्दी सूरज ढल जाता है  
सुबह मुशिकिल से किरण मिल पाता है 
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है  
कोहरो की भरमार रहती  है
आग के पास ही लोग नजर आएंगे 
बहार निकलते साथ बदल जाएंगे 
अंदर रजाई कि ही सहारा होती है 
बाहर जैकेट से गुजारा है 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कोई टिप्पणी नहीं: