"कोहरे ठंडी की"
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है।
कोहरो की भरमार रहती है।।
मौसम थोडा भीगा रहता है।
कभी धूप खिल जाता है। ।
शाम को जल्दी सूरज ढल जाता है ।
सुबह मुशिकिल से किरण मिल पाता है ।।
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है ।
कोहरो की भरमार रहती है।।
आग के पास ही लोग नजर आएंगे ।
बहार निकलते साथ बदल जाएंगे ।।
अंदर रजाई कि ही सहारा होती है ।
बाहर जैकेट से गुजारा है ।।
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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