सोमवार, 19 जनवरी 2026

कविता: "31 दिसम्बर 2025 की दिन"

"31 दिसम्बर 2025 की दिन"
हर साल आता है नए किस्से लेकर। 
पुराना साल गुज़र जाता है उम्मीदे देकर । 
रोती रह जाती है ये गलियाँ । 
गुजरती शाम और चाँद देकर । 
क्या - क्या  किस्से छोड़ जाता है गुजरता साल । 
सारी खामोशी तोड़ देता है एकबार । 
जिक्र नहीं करते है जिसका हम कभी । 
एसी कुछ कहानियाँ भी छोड़ जाता है साल । 
आती हर खुशी वजह होता है साल । 
गुजरती जनवरी को अलविदा कहकर । 
आते दिसम्बर का इन्तजार होता है । 
अधूरे किस्से को पूरा करने के लिए । 
हर बार आता है नया साल । 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

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