"31 दिसम्बर 2025 की दिन"
हर साल आता है नए किस्से लेकर।
पुराना साल गुज़र जाता है उम्मीदे देकर ।।
रोती रह जाती है ये गलियाँ ।
गुजरती शाम और चाँद देकर ।।
क्या - क्या किस्से छोड़ जाता है गुजरता साल ।।
सारी खामोशी तोड़ देता है एकबार ।।
जिक्र नहीं करते है जिसका हम कभी ।
एसी कुछ कहानियाँ भी छोड़ जाता है साल ।।
आती हर खुशी वजह होता है साल ।।
गुजरती जनवरी को अलविदा कहकर ।
आते दिसम्बर का इन्तजार होता है ।।
अधूरे किस्से को पूरा करने के लिए ।
हर बार आता है नया साल ।।
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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