मंगलवार, 19 मई 2009

सम्पादकीय, ११ मई, २००९

सम्पादकीय
प्यारे दोस्तों,
हमारा बाल सजग अच्छे से चल रहा है। बाल सजग में लिखे गए कवितायें और कहानियाँ अपने ब्लॉग बाल सजग पर लगातार प्रकाशित हो रही है। ४ मई को हिंदुस्तान दैनिक अख़बार ने भी अपने ब्लॉग की चर्चा अपने अख़बार में करके हमारा हौसला अफजाई किया है। हम सभी को इस बात की खुशी है कि हमारी मेहनत अब धीरे-धीरे सफल हो रही है। ब्लॉग में लिखे गए हमारी कवितायें, कहानियाँ को पढ़ कर लोगों द्वारा दी गई टिप्पणियाँ हमें लगातार और लिखने के लिए उत्साहित करती है। साथियों अभी लोकसभा का चुनाव ख़त्म हुआ है, देखना है कि कौन सी पार्टी या निर्दलीय नेता चुनकर लोकसभा में जाते है, और देश तथा लोगों कि भलाई के लिए क्या काम करते है। साथियों हमारी गर्मी कि छुट्टिया चल रही है, इन छुट्टियों के दौरान हम कुछ नया लिखें और अपने बाल सजग को और अच्छा और सुंदर बनाने कि कोशिश करें। हम अपनी कल्पनाओं को और ऊँचा ले जायें ताकि सुंदर औए मज़ेदार रचना हो सके।
धन्यवाद् फ़िर मिलते है....
अशोक कुमार, कक्षा ६
११ मई , २००९
संपादक, बाल सजग
अपना घर ,बी० /१३५-८, नानाकारी, प्रधान गेट
आई० आई० टी०, कानपुर-१६
फोन: ०५१२-2270589

कविता: प्यारे फूल

प्यारे फूल
कितने प्यारे फूल है।
सबके प्यारे फूल है॥
जब यह महके तो जग महके।
बगिया में खिलते हरदम रहके॥
इनको देख के खुलते अक्ल के ताले।
मन के हट जाते सब जाले॥
नही किसी से इनका बैर।
सब देशो से इनका मेल॥
हर देशो से इनका नाता।
फूल सभी के मन को भाता॥
दुनिया करती इनकी सेवा।
सेवा करो तो पाओ मेवा॥
फूल है दुनिया के नन्हें तारे।
तभी तो है ये सबके प्यारे॥
महक है इनकी कितनी न्यारी।
खुशबू देते कितनी सारी॥
सबके मन को लगती न्यारी।
फूल की दुनिया सबसे प्यारी॥

कविता: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर


















सोमवार, 18 मई 2009

कविता: गर्मी की छुट्टी

गर्मी की छुट्टी
गर्मी आई गर्मी आई।
सर्दी को दूर भगाई॥
गर्मी में हो गई छुट्टी।
पढ़ाई से हो गई कुट्टी॥
गर्मी की छुट्टी में नैनीताल जायेंगे।
मिलके सभी हम खुशियाँ मनाएंगे।।
नानी से मिलने उनके घर जायेंगे।
नाना के संग बाजार घूम आएंगे।।
गर्मी में आइसक्रीम खूब खायेंगे।
पानी में नहाकर गर्मी दूर भगायेंगे॥
स्वस्थ शरीर हम पाएंगे।
गर्मी में नैनीताल जायेंगे॥

कविता: मुकेश कुमार, कक्षा ७, अपना घर
पेटिंग: अशोक कुमार, कक्षा ६, अपना घर

कविता: गर्मी


गर्मी
हवा चल रही है क्या पुरवाई ।
झूम रही है हर पेड़ की डाली॥
सन - सन चल रही गरम लपट।
पतंग हमारी उड़ रही है फटाफट॥
ऐसे में पतंग भला कौन न उडाये।
इतनी गर्मी में भला कौन न नहाये॥
चलो गर्मी के बहाने लस्सी पिया जाए।
लस्सी पीकर चलो पेड़ के नीचे बैठा जाए॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: अक्षय कुमार, कक्षा ६, अपना घर


कहानी: ऊंट और सियार

उंट और सियार
एक बड़ा सा जंगल था, उस जंगल में एक सियार और एक ऊंट रहता था, उन दोनों में पक्की दोस्ती थी। उंट बहुँत ही शांत और समझदार था पर सियार कुछ ज्यादा ही चालक और गुस्सैल था। सियार हमेशा ऊं के बारे में बुरा सोचता रहता था। एक दिन सियार और ऊंट में किसी बात को लेकर बहस छिड़ गई। सियार बातो ही बातो में गुस्सा होने लगा अचानक सियार को बहुँत गुस्सा आ गया। सियार गुस्से में बोला अगर तू चुप नही हुआ तो मै तुझे मारकर तेरा मांस भी खा जाऊंगा। ऊंट ये नही चाहता था की आपस में कोई झगडा हो इसलिए उंट शांत होकर बोला मै नही चाहता आपस में कोई झगडा हो अगर मुझे से कोई गलती हुई है तो मै तुमसे माफ़ी मांगता हूँ। ऊंट ने कहा मुझसे जो भी अब तक गलती हुई है उन सबके लिए मै माफ़ी मांगता हूँ अब मुझे माफ़ कर दो, और अब मै ये जंगल भी छोड़कर जा रहा हूँ ताकि तुम्हे कोई कष्ट न हो, इतना कहकर ऊंट जंगल से चल पड़ा। सियार को ये सब सुनकर बड़ा अफ़सोस हुआ की गलती मेरी है और ऊंट मुझसे ही माफ़ी मांग रहा है। उसे बहुँत पछतावा हुआ, सियार दौड़ कर गया और ऊंट के पैरो से लिपट गया और कहा मुझसे गलती हुई है मुझे माफा कर दो और जंगल छोड़कर मत जाओ। आगे से मै ऐसा कभी नही करूँगा, ऊंट ने उसे उठाकर गले से लगा लिया। ऊंट और सियार फ़िर आपस में प्यार और मजे से रहने लगे...
कहानी: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: सागर कुमार, कक्षा , अपना घर

रविवार, 17 मई 2009

कहानी: मास्टरनी रीना ने बदली गाँव के तस्वीर

मास्टरनी रीना ने बदली गाँव के तस्वीर
एक समय की बात है। एक गाँव में एक गरीब आदमी रहता था, जिसका नाम दयाशंकर था। वह बहुत ही निर्धन आदमी था, उसका जन्म १७ जनवरी १९६६ को हुआ था। वह किसानी का काम करता था। उसके गाँव का नाम रामपुर था, वह गाँव बहुत साफ - सुथरा और खुशहाल था, लेकिन वंहा के लोग बहुत गरीब थे। उस गाँव में शिक्षा का कोई प्रबंध नही था। दयाशंकर अनपढ़ आदमी था, इस कारण जब वह पास के शहर में काम करने जाता तो ठेकेदार उसे पूरी मजदूरी न देकर सिर्फ़ आधी मजदूरी देता था। दयाशंकर अपने चारो बेटों को पढ़ना चाहता था, लेकिन रामपुर में कोई स्कूल ही नही था। वहां के प्रधान उमाशंकर बड़े ही दुष्ट प्रकार के इन्सान थे। वे सिर्फ़ लोगों से वोट मांगते थे मगर गाँव की समस्याओं की तरफ कोई ध्यान नही देते थे। गाँव के सड़क, नाली लोगो को रासन, स्कूल आदि किसी समस्याओ का निदान नही करते थे। दयाशंकर के पत्नी रीना थोड़ा बहुत पढ़ी - लिखी थी। रीना ने अपने बच्चो को ख़ुद पढ़ना शुरू किया, पास के और बच्चे पढ़ने आने लगे, दयाशंकर के घर में ही स्कूल शुरू हो गया। गाँव के और बच्चे सुनीता, मोनी, राजेश, ब्रिजेश, महेश, सोनू, रानी, गीता और अन्य सभी बच्चे स्कूल आने लगे। गाँव के सब लोग रीना को अब मास्टरनी जी कहके बुलाने लगे। गाँव के सभी बच्चें मन लगाकर पढ़ाई करने लगे, रीना भी उन्हें खेल खिलाकर , गीत, गाना के माध्यम से पढाने लगी, धीरे - धीरे सभी बच्चे लिखना, पढ़ना और जोड़- घटना आदि सब सीख गए। पढ़लिखकर बच्चे अब बड़े हो गए थे, वे शहर में जाकर मजदूरी करने लगे, पढ़े - लिखे होने के कारण उन्हें अब पूरी मजदूरी मिलाने लगी। अगले साल चुनाव आया सभी लोगो ने मिलकर मास्टरनी रीना को प्रधान के चुनाव में खड़ा किया। गाँव के सभी लोगो ने मास्टरनी रीना को अपना वोट दिया, वो चुनाव जीत कर रामपुर गाँव की प्रधान बन गई। अब गाँव में विकास के सारे काम शुरू हो गए। गाँव में पक्की सड़क और नाली बन गई मास्टरनी जी के प्रयास से उस गाँव में एक सरकारी स्कूल भी खुल गया। अब गाँव के सभी बच्चे स्कूल जाने लगे और पढ़ाई करने लगे। गाँव के लोगों को अब पूरी मजदूरी भी मिलने लगी, धीरे - धीरे पूरे गाँव के तस्वीर ही बदल गई। इस तरह से रामपुर गाँव एक शिक्षित और खुशहाल गाँव बन गया।
कहानी: मुकेश कुमार, कक्षा ७, अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा ६ , अपना घर


शनिवार, 16 मई 2009

कविता: मै भी पढ़ने जाऊंगा


मै भी पढ़ने जाऊंगा
पापा मै भी पढ़ने जाऊंगा।
पढ़ लिखकर महान बनूँगा॥
अच्छे से अच्छा काम करूँगा।
पापा आपका नाम करूँगा॥
पापा मै भी पढ़ने जाऊंगा।
पढ़ लिखकर महान बनूँगा॥
सदा आपका कहना मानूंगा।
गरीबो की हमेशा मदद करूँगा॥
पापा मै भी पढ़ने जाऊंगा।
पढ़ लिखकर महान बनूँगा॥
देश की मै रक्षा करूँगा।
देश की खातिर जान भी दूंगा॥
पापा मै भी पढ़ने जाऊंगा ।
पढ़ लिखकर अच्छा इन्सान बनूँगा॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: मुहम्मद चंदन तिवारी, कक्षा , अपना घर

कविता: परीक्षा


परीक्षा
जब वार्षिक परीक्षा आई।
तो हमार सिर चकराई॥
नींद ऊपर से आई।
जम्हाई अलग से आई॥
पर क्या करे ? पेपर है सिर पर।
लेके कापी बैठ गए छत पर॥
नंबर आई अगर कम।
तो निकल जाई हमार दम॥
यही सोच के हम पछताई।
की परीक्षा कब खत्म हो जाई॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर

सोमवार, 11 मई 2009

कविता: मच्छर

मच्छर
देखो मच्छर की टांगे चार।
काटे तो हम हो जाए बीमार॥
फैले बीमारी मलेरिया हैजा।
रोटी खाने में न आए मजा॥
पड़े रहे फ़िर घर के अन्दर।
काम न करने जा पाए बाहर॥
मच्छर गंदे पानी में रहते।
रुके पानी में हरदम पलते॥
घूम - घूम को रात को काटे।
बीमारी एक दूजे को बांटे॥
पानी साफ हमेशा रखना।
सब बच्चों का यही है कहना॥
जो मच्छर को दूर भगाओगे।
फ़िर तन मन अच्छा पावोगे॥

कविता
: मुकेश कुमार , कक्षा ७, अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर

कहानी: भूख से हुई मौत

भूख से हुई मौत
एक गाँव में एक आदमी था, वह बेचारा बहुत ही गरीब और ईमानदार आदमी था, वह अपनी टूटी हुई झोपड़ी में रहता था। उसके परिवार में उसके साथ उसकी पत्नी और एक बेटा रहता था। वह आदमी रोज काम करने दुसरे गाँव में जाता था, उससे जो भी आमदनी होती उसी से उसके परिवार का खर्चा चलता था। जब तक वह काम करता रहा तब तक उसका घर चलता रहा, मगर एक दिन वह बीमार पड़ गया और काम पर नही जा सका। अगले दिन वो काम पर जाने की कोशिश किया मगर वह बहुँत ही कमजोर हो चुका था, वो चाह कर भी बिस्तर पर से उठ नही सका। घर में बस थोड़ा सा आनाज बचा था, अब घर में खाने के लिए कमी होने लगी। उसका घर गाँव से थोड़ी दूरी पर था, गाँव के लोग इधर की तरफ बहुत कम ही आते थे। बारिस का समय होने के कारण अब बारिश भी शुरू हो गई थी। अचानक रातो दिन तेज बारिश होने लगी, वह बेचारा बारिश और बीमारी के कारण काम करने नही जा पा रहा था। अब उसके घर का सारा रासन खत्म हो गया सिर्फ़ पानी पीकर पूरा परिवार गुजारा करते थे, अब उन तीनो में उठने की भी ताकत धीमे-धीमे खत्म हो रही थी, धीरे- धीरे वह तीनो भूख से मरने लगे। पास के नदी का पानी बारिश के कारण उफान पर था। अगले दिन तीनो भूख से लड़ते - लड़ते अंततः मर गये... सारा दिन उनकी लाश उस टूटी झोपड़ी में पड़ी रही.. और बाहर भयंकर तूफ़ान के साथ जोरो की बारिश होती रही.... रात को नदी में जोरो की बाढ़ आ गयी और बाढ़ का पानी अपने साथ उन तीनो और उनकी टूटी झोपड़ी को इस गाँव से बहुत दूर बहा कर ले गई... जहाँ भूख से कोई नही मरता......
कहानी: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: सागर कुमार, कक्षा ५, अपना घर

शनिवार, 9 मई 2009

कविता: चुनमुन चिड़िया


चुनमुन चिड़िया
आओ बच्चों सुनो कहानी।
एक था राजा थी रानी॥
रानी ने एक चिड़िया पाली।
शक्ल की थी वो भद्दी काली॥
कद में तो वह छोटी थी।
पर कुप्पे सी मोटी थी॥
गले में था चमड़े की पट्टी।
काम में थी वो हट्टी - कट्टी॥
मक्के की रोटी खाती थी।
फुर्र से वो तब उड़ जाती थी॥
कविता: रामकृष्ण , कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर