शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

कविता - सैर चलो हम करे

  सैर चलो हम करे
चलो हम सैर करे ,
किसी से बैर न करे......
लड़ाई किसी से न करे,
सभी बच्चो ने देखा चीता....
लेकिन मैंने देखी सूत ,
वही से निकल पड़ा भूत.....
हम अब सैर नहीं करेगे ,
क्योकि मिल जाता हैं रास्ते में भूत....

 लेखक  - चन्दन कुमार 
 कक्षा - ६ अपना घर , कानपुर

कविता - जल और पर्यावरण

 जल और पर्यावरण 
पानी से ही हैं हम सबका जीवन ,
खूब करो तुम जल का उपयोग .....
लेकिन कभी अपने लिए तुम,
पानी का मत करो  दुर्पयोग.....
 जल के  द्वारा ही होते  ये ,
हरे - भरे पेड़ पौधे.....
मत काटो इन पेड़ो को तुम,
आक्सीजन हमको ये प्रदान  करते.....
 गाडी मोटर और फैक्ट्रियो से ,
  प्रदूषित  होता हैं ये पर्यावरण......
   मेरा कहना  हैं सब लोगो से,
 साफ रखो तुम अपना वातावरण.....

लेखक - धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर ,कानपुर

रविवार, 7 अगस्त 2011

कविता : हमारा ब्रम्हाण्ड

कविता : हमारा ब्रम्हाण्ड

हमारा ब्रम्हाण्ड है बड़ा अनोखा,
गौर से नहीं इसको हमने देखा ....
क्या वहां पर भी होगा येसा जीवन,
कैसा होगा वहां का पर्यावरण ....
रात को हैं ये टिमटिमाते तारे ,
देखने में लगते हैं ये कितने प्यारे....
ब्रम्हाण्ड को जानने की बड़ी लालसा ,
चाँद पर जाने की है मेरी भी आशा .....
एक छोटा सा है संसार हमारा ,
कितना अच्छा है कितना प्यारा....
धरती हमारी सहती है कितना भार,
क्या सोंचा है कभी हमने एक बार ...
लेखक : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर


शनिवार, 6 अगस्त 2011

कविता - पहल होगी चारों ओर

 पहल होगी चारों ओर  
जब सूरज  ढल जाएगा ,
 तब बालक सो जाएगा .....
 सूरज के आते ही ,
वह भी उठ जाएगा......
 कलियाँ खिलेगी पुष्प सुगंध देगे,
 भँवरे उस पर मंडराएगें ......
 कौवा बैठा डालपर बोल उठेगा,
 आम खाता तोता टाव - टाव कर गाएगा   ......
 सब पक्षी चह चाहएंगे    ,
बच्चे शोर मचाएंगे   ......
हवा चलेगी चारों ओर ,
 बच्चो की पहल होगी चारों ओर...... 


लेखक - आशीष कुमार 
 कक्षा - ९ अपना घर कानपुर

कविता - जल

जल 
पानी जीवन हैं सबका 
 आदमी हो या बच्चा  
 जल तो होता हैं तरल 
 बहे तभी जब ढाल 
 H और O का मिश्रण  
 साथ में होता हैं लवण  
 रसायन  में जाना हमने 
  दो H और O इसमे 
 फ्री  में जल मिलेगा भइया 

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

कविता - हर उमगों से

हर उमगों से 
 मन की हर उमगों से ,
 ये जीवन भरा हैं तरंगो से.....
 हर एक की अपनी उमगें,
निकल रही उसमें तरंगें .....
 कैसी हैं हर उमगें ,
 नहीं निकलेगी ज्वाला की तरंगें.....
 मिला दो उसमे ऐसी उमगें ,
  मिट जाए  उसकी तरंगें .....
 मन की हर उमगों से ,
ये जीवन भरा हैं तरंगों......

 लेखक - अशोक कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर, कानपुर

सोमवार, 1 अगस्त 2011

कविता : गंगा के उस पार चलें

गंगा के उस पार चलें 

 चलो-चलो अब सैर करें, 
गंगा के उस पार चलें....
गंगा के उस पार जायेगें,
मौज मस्ती करके आयेगें.....
हवा चलेगी ठंडी-ठंडी,
 मौसम होगा खूब सुहाना....
चलो-चलो अब सैर करें,
गंगा के उस पार चलें....
पानी होगा कितना निर्मल,
ठंडा और होगा शीतल....
 चलो-चलो अब सैर करें,
गंगा के उस पार चलें...

लेखक : मुकेश कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर 

शनिवार, 30 जुलाई 2011

कविता - भ्रष्ट नेता

भ्रष्ट नेता 
भ्रष्ट हैं पुलिस भ्रष्ट हैं नेता ,
बैठे- बैठे कुछ नहीं करते .....
जब चोरी चमारी होती हैं  ,
 तो  खड़े- खड़े बस ताका करते....
 जब आती हैं चुनाव की बारी ,
 तो सबके घर जाया करते ......
 भ्रष्ट हैं पुलिस भ्रष्ट हैं नेता......
 लेखक - सागर कुमार
 कक्षा -८  अपना घर ,कानपुर

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

कविता - लुगाई के खातिर की कमाई

लुगाई के खातिर की कमाई 
 एक व्यक्ति ने की इतनी कमाई ,
जिससे ला सके वह एक लुगाई......
 एक दिन बैठा लगा सोचने ,
 उसी दिन गया वह लुगाई देखने .....
 लुगाई उसको पसंद आई ,
 तय हो गयी उन दोनों की सगाई,
जब वापस घर को था लौटना ......
 उसी क्षण हुई उसके संग एक दुर्घटना ,
 दुर्घटना में उसने एक हाथ ,एक पैर ,एक आंख गंवाई.....
ठीक  होने के लिए उसने सारी सम्पति लगाई,
 लुगाई को तब पता चला ......
 उसने तोड़ दिया उससे रिश्ता,
सारा जीवन रह गया बेचारा  कुंवारा घिसता...... 
 जितना गम नहीं था उसे अपने अंग खोने से ,
उससे ज्यादा गम  था उसकी सगाई न होने से..... 
   

लेखक - आशीष कुमार , कक्षा  - ९,  
अपना घर कानपुर               

बुधवार, 27 जुलाई 2011

कविता : सरकार को शायद नहीं पता

सरकार को शायद नहीं पता 

हर एक चौराहों पर ,
खड़े हैं पुलिशवाले.....
चौराहों की चौकी में बैठकर,
पूंछते हैं अपनी जन्म कुंडली......
 उनकों शायद यह नहीं पता कि,
चौराहों पर लग गयी है वाहनों की मंडली....
सरकार को भी शायद यह नहीं पता ,
पुलिशवाले किसको रहें हैं सता ..... 

लेखक : ज्ञान कुमार 
कक्षा : 8
अपना घर 

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

कविता : हो मानव का कल्याण

 हो मानव का कल्याण

 मच गया सभी जगह हा-हा कार ,
कौन है तेरे बिन बेकार .....
समझ है पर ज्ञान नहीं ,
लेकर तू गुरुजनों का ज्ञान ....
कर तू विश्व में अपना नाम ,
जिससे देश न हो बदनाम .....
कर तू हर दम येसे ही कार्य ,
जिससे मानव का हो कल्याण.....

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर