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बुधवार, 17 अगस्त 2011

कविता : चाहत

 चाहत 

वे लोग भी क्या होते हैं ,
जिनकी कुछ चाहत होती.....
वे कुछ भी करते ,
उनकी अलग ही पहचान होती.....
उसमें जरुर किसी की बात होगी,
वह पता नहीं कौन सी बात होगी....
जरुर उसकी कुछ ख़ास बात होगी,
जिसमें उसकी यह पहचान होगी .....
अपनी हर बात होती है ,
जो किसी तरह से ख़ास होती है.....

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : ९
अपना घर  

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

कविता : हो मानव का कल्याण

 हो मानव का कल्याण

 मच गया सभी जगह हा-हा कार ,
कौन है तेरे बिन बेकार .....
समझ है पर ज्ञान नहीं ,
लेकर तू गुरुजनों का ज्ञान ....
कर तू विश्व में अपना नाम ,
जिससे देश न हो बदनाम .....
कर तू हर दम येसे ही कार्य ,
जिससे मानव का हो कल्याण.....

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर 

मंगलवार, 7 जून 2011

कविता : सबको अधिकार हो

 सबको अधिकार हो 

हमें वह राह चाहिए ,
जिसमें सबको जाने का अधिकार हो .....
न कोई ताला चाभी का साथ हो ,
सबको सामान अधिकार हो .....
हमें वह राह चाहिए ,
जिसमें सारे इंसान जाएँ ....
अमीरी-गरीबी का भेद न हो ,
सारे इंसान बराबर हों .....
हमें वह राह चाहिए ,
जिसमें सबको जाने का अधिकार हो .....

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर   

बुधवार, 2 मार्च 2011

कविता : रहे न बदन में लत्ता

रहे न बदन में लत्ता 
पूरब से निकला सूरज ,
पश्चिम को जाता है ....
मध्य में जब वह आता है ,
ऐसी रोशनी फैलाता है ....
हर मानव छाया में जाता है ,
क्योंकि उस समय ऐसा लगता है .....
जैसे बदन मानव का जलता है ,
क्योंकि बदन में न होता लत्ता है .....
पूरब से निकला सूरज ,
पश्चिम को जाता है  ......

लेखक :अशोक कुमार , कक्षा: 8 ,अपना घर 

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कविता: वे कुछ बनने आये है ....

वे कुछ बनने आये है ....

घुस- घुस कर ट्रेनों में।
लोग ही लोग आये है॥
वे अपने बड़े-बड़े बैगों में।
किताबे भर-भर लाए है॥
वे इंजिनियर बनने आये है।
वे पी० एच० डी करने आये है॥
वे डाक्टर बनकर जायेगें।
फिर वापस लौट के आयेंगे
अब प्रोफ़ेसर बनने आयेंगे
अपने को बदल कर आयेंगे॥
वे अब अंग्रेजी ही बोला करते है।
वे शायद अब हिंदी से डरते है॥
हिंदी में अब लिख नहीं पाते।
हिंदुस्तान में जी नहीं पाते
वे किताबे भर - भर लाये थे।
अब रुपया भर-भर ले जाते है॥
जो ट्रेनों में कभी आये थे।
आज प्लेनों में ही जाते है॥
घुस- घुस कर ट्रेनों में।
लोग ही लोग आये है॥
वे अपने बड़े-बड़े बैगों में।
किताबे भर-भर लाए है॥


लेख़क: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर
"संपादक ", बाल सजग

सोमवार, 15 मार्च 2010

कविता कभी न पहुचना एवरेस्ट शिखर के पास

कभी न पहुचना एवरेस्ट शिखर के पास
यह संसार हमारा ,
यह भूमि हमारी....
सबको हैं जीने क अधिकार,
एवं सब बने एक दिन महान....
कभी न बनाना इतने महान,
की पहुच जाओ एवरेस्ट शिखर के पास.....
मत भूलना कभी अपनी औकात,
रहना इसी भूमि....
एवं विश्व ग्राम के साथ,
चाहे क्यों न बन जाऊं महाराज....
सभी से मिलाना उसी तरह से,
जैसे चलते थे तुम....
अपने मित्रो के संग,
लेकिन कभी न बनना इतने महान....
की पहुँच जाओं एवरेस्ट शिखर के पास.....
लेखक अशोक कुमार कक्षा ७ अपनाघर कानपुर

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कविता -जिसके पास सब कुछ है

जिसके पास सब कुछ है

चल पड़ा है अपने साधन से ।
रोड़ के किनारे से ॥
अपने दफ्तर की ओर को ।
मस्ती से जा रहा है ॥
गाना सुनते हुए ।
मोबाइल जेब में डाले हुए ॥
चला जा रहा है ।
मस्ती से गाना सुनते हुए ॥
अपने दफ्तर की ओर को ।
जिसके पास सब कुछ है
लेखक -अशोक कुमार
कक्षा -
अपना घर