शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कविता: आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ

मै एक आदमी हूँ ......

मै एक आदमी हूँ,
लेकिन आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ
मेरे पास दिमाग है,
लेकिन वह बेकार है।
उन्नति तो हमने बहुँत किया,
मगर समाज को कुछ दिया।
इस हरी भरी दुनिया को,
छिन्न - भिन्न कर गया।
एक दिन ऐसा आएगा,
दुनिया खत्म हो जायेगा।
इसका कारण एक है,
किन्तु वह अनेक है।
दो हाथो दो पैरो वाला है,
खोज-बीन करने वाला है।
दुनिया में पता नहीं क्या क्या बनाया,
इस पूरी धरती पर प्रदूषण फैलाया।
जिस मिटटी में हम पैदा हुए,
उसी को हम सब लूट लिए।
इन्सान से अच्छा जानवर है,
प्रकृति के हरदम साथ है।
अच्छा भोजन खाता है,
अपनी बात फरमाता है।
जंगल जमीन में रहता है,
जंगल का साथ निभाता है।
मै एक आदमी हूँ ,
लेकिन अपने आप पर शर्मिंदा हूँ

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर




कविता: राजा ने किया रानी से मजाक

राजा ने किया रानी से मजाक

एक
दिन राजा बोले रानी से ,
आलू लाओ जाकर खेतो से
रानी बोली मै नहीं जाउंगी खेतो में,
चाहे मुझको रखो तुम अपने घर में
सुनकर रानी की ऐसी बानी,
राजा पीने लगे जल्दी से पानी
राजा बोले मैंने तो मजाक किया,
तुमने उसको सच मान लिया
तुम तो हो इस घर की रानी,
समझा करो तुम मेरी बानी
रानी बोली ऐसा मजाक मुझसे करना,
चली जाउंगी मायके तब पछताते रहना।
राजा बोले माफ़ करो चुप हो जाओ रानी,
भूख लगी है लाओ जल्दी दे दो खाना पानी
किसकी कविता किसकी कहानी,
राजा रानी की ख़त्म हुई कहानी

लेखक: आशीष कुमार, अपना घर, कक्षा ७

रविवार, 11 अप्रैल 2010

कविता :सुनो पर्यावरण की आवाजें

सुनो पर्यावरण की आवाजें

पर्यावरण और कल कल झरनों की आवाज
महसूस करो दोस्तो गंगा-यमुना की आवाज
एक समय ऐसा भी था
गंगा-यमुना समुन्दर जैसी थी
गंगा-यमुना के पानी से
क्यों कर रहे हैं कोका-कोला तैयार
क्या तुम्हें याद हैं एक बात
पड़ गया था पानी का आकाल
उस समय येसा था
गंगा-यमुना में पानी कम था
गंगा-यमुना को है बचाना
वातावरण को है सुन्दर बनाना


लेखक :सागर कुमार
कक्षा :
अपना घर

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कविता सारे आम गिरे तोते के शोर से

सारे आम गिरे तोते के शोर से
हरी डाल पर बैठा तोता ,
हमने देखा वह पका आम खता.....
मै नीचे बैठा वह ऊपर बैठा,
उस आम के लिए मै एठा......
मै बैठा सोचू कि यह आम मुझे ही मिले,
इसका रस मेरे पेट में जाकर टहले.....
बार बार तोता मेरी ओर देखता ,
मुझे देखकर ठाँव ठाँव कर गता......
तब तक आम गिरा वह नीचे,
उसे उठाने दौड़ा मैं उसके पीछे......
जैसे ही उसको पाया धुल कर मैं ने खाया ,
उसको खाने में बड़ा मजा आया.....
तब तक तोता रोया इतनी जोर से,
पेड़ के सारे आम गिरे उसके इस शोर से .....
सारे आमो को हमने उठाया,
फिर जाकर घर में सबके साथ में खाया......
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

कविता :फाल्गुन का महीना बीता

फाल्गुन का महीना बीता

जब हम जागते सोकर
तब सूरज निकलता धूप लेकर
सूरज अपनी किरणों को ऐसे बिखेरता
जैसे होली में चारो ओर अबीर उड़ता
फाल्गुन का महीना बीता
अगली सुबह चैत्र का महीना सूरज लेकर आता
बैसाख के महीने में स्कूल बंद हो जाते
सब बच्चे गर्मी में मौज-मस्ती करते
शाम को सूरज ढलता
सारी किरणों को अपने संग में ले जाता
अगले दिन सूरज नयी सुबह लेकर आता
सब लोगों के मन की धूप खिलाता

लेखक : आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

कविता रेल चली

रेल चली
रेल चली रेल चली ,
डग मग डग मग करती रेल चली.....
यहाँ वहा पहुचाती रेल चली,
रेल हमें सीटी बजा कर बुलाती ....
कुछ यात्री चढ़ नहीं पाते,
जो चढ़ नहीं पाते वापस घर लौट आते......
दूसरे दिन रेल को पकड़ पाते,
जहा पहुचना वहा पहुच पाते.....
रेल चली रेल चली,
सीटी दे कर रेल चली......
लेखक चन्दन कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता रेल चली

रविवार, 4 अप्रैल 2010

आम
आम रसीले देखकर ,
आया मुंह में मेरे पानी.....
चढ़ कर पेंड पर ,
मैंने उसको तोडा.....
आम लागे थे चार,
आम मैंने खाया यार.....
आम रसीले खा कर के,
मुझको आई मजा.....
चदा था पेड़ पर मै,
डाल छुली गिरा मै नीचे....
आम खाने की मिली सजा ....
लेखक सोनू कक्षा अपना घर कानपुर

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

कविता :बिल्ली की रानी

बिल्ली की रानी

आती है रात को ।
बिल्ली की रानी ॥
पीती है दूध और पानी ।
चुपके से पी जाती है ॥
आहट सुन कर डर जाती है ।
एक भी नहीं चिल्लाती है ॥
खिड़की से निकल जाती है ।
अपनी आदत भूल जाती है ॥
आती है रात को ।
बिल्ली की रानी ॥

लेखक :ज्ञान कुमार
कक्षा :६
अपना घर

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

कविता करो वन तैयार

करो वन तैयार
लगा लगा के व्रक्षों को ,
फिर से कर दो वन तैयार....
जिससे वह समय याद,
जिसमे होते गिद्द हजार.....
होता प्रथ्वी को नुकशान,
लगा लगा के व्रक्षों को,
फिर दो वन तैयार......
जिसमे प्रथ्वी जाय वातानुकूल,
फिर से हो जाय वह हरियाली......
जिसे देख हवा चले सुहानी,
वह प्रथ्वी की पपड़ी......
फिर से हो जाय तैयार,
जिससे हो रही हैं गर्मी इतनी......
जिससे हयरान हैं मुल्क की आबादी,
लगा लगा के व्रक्षों को.....
फिर से कर दो वन तैयार,
लेखक अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

कविता :काली रात

काली रात

अधेंरी काली रात थी
चूहों की बारात थी
बारात में चोर आये थे
चूहों को मार भगाए थे
जब चूहे वापस आये थे
साथ में अपनी फौज लाये थे
सब चोरों को मार भगाए थे
हलुआ पूड़ी खूब खाए थे ॥
अंधेरी काली रात थी
चूहों की बरात थी

लेखक :सागर कुमार
कक्षा :
अपना घर