शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

कविता करो वन तैयार

करो वन तैयार
लगा लगा के व्रक्षों को ,
फिर से कर दो वन तैयार....
जिससे वह समय याद,
जिसमे होते गिद्द हजार.....
होता प्रथ्वी को नुकशान,
लगा लगा के व्रक्षों को,
फिर दो वन तैयार......
जिसमे प्रथ्वी जाय वातानुकूल,
फिर से हो जाय वह हरियाली......
जिसे देख हवा चले सुहानी,
वह प्रथ्वी की पपड़ी......
फिर से हो जाय तैयार,
जिससे हो रही हैं गर्मी इतनी......
जिससे हयरान हैं मुल्क की आबादी,
लगा लगा के व्रक्षों को.....
फिर से कर दो वन तैयार,
लेखक अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर सन्देशभरी कविता!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा संदेश!! बढ़िया!