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रविवार, 18 सितंबर 2011

कविता : प्रकृति के रस गान

 प्रकृति के रस गान 

संसार है अपना कितना अनमोल ,
कितना अच्छा है हम लोगों का भुगोल.....
इस संसार में तरह-२ के जन्तु पाए जाते,
जो हम लोगों को सुंदर गीत सुनाते....
हरी भरी दुनियाँ है हमारी,
इसमें होती हैं फसलें प्यारी....
कृषी प्रधान है देश हमारा,
किसानों से प्यार करने वाला.....
जहाँ गंगा माँ जैसी नदी है बहती,
वहाँ की धरा खूब उपजाऊ है होती.....
संसार है अपना कितना अनमोल,
कितना अच्छा है हम लोगों का भुगोल....

लेखक : मुकेश कुमार 
कक्षा :10
अपना घर  

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

कविता : दादा जी ने समझाया

दादा जी ने समझाया  

दादा जी ने यह समझाया ,
बच्चों धमा-चौकड़ी मत करो .....
पढ़ो लिखो तुम आराम करो,
जग में रोशन नाम करो तुम .....
अच्छे नागरिक बन जाओगे ,
समाज को अच्छी राह दिखलाओगे......
बच्चे बोले धमा-चौकड़ी नहीं करेगें ,
अपने घर में जी जान से पढ़ेगें .....


लेखक :मुकेश कुमार 
कक्षा :9
अपना घर 

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कविता सही हमें नहीं पता

सही हमें नहीं पता
असमान हैं नीला नीला ,
कपडे पहने पीले पीले....
पानी बरसे होले होले,
असमान हैं क्या .....
हमें नहीं हैं पता ,
पानी क्यों बरता हैं....
बिजली क्यों गरजती हैं,
असमान हैं नीला क्यों....
यह हमें नहीं पता हैं,
यह हमारी मजबूरी हैं....
दूसरे हमें सताते हैं,
जो कोई भी पूछता हैं....
तो गलत बताते हैं ,
सही उत्तर हम नहीं जानते हैं....
असमान हैं नीला नीला,
कपडे पहने पीले पीले ....
लेख़क मुकेश कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कविता ये हैं घनघोर आसमान

ये हैं घनघोर आसमान
ये हैं घनघोर आसमान ,
हरदम रहता सीना तान....
लेकर अपनी तलवार और कमान,
हर वक्त करता पानी की बरसात.....
दिन हो या पूर्णा की रात,
पानी की करता हैं बरसात....
ये आसमान नहीं चमन हैं,
यहाँ राजपूतो का अमन हैं....
जहाँ पानी बरसता हैं,
बिजली गरजती हैं....
तब पानी बरसता हैं,
ये हैं घनघोर आसमान....
हरदम रहता सीना तान.....
लेखक मुकेश कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

सोमवार, 16 अगस्त 2010

कविता तारा

तारा
एक हैं तारा ,
कई सितारे....
जग मग करते,
आकाशा में सारे....
एक चमकते हैं तारे,
नहीं कभी जिन्दगी से हारे.....
आकाशा में घूमता मारा मारा,
पूछने वाला कोई नहीं बेचारा.....
तारे हैं बहुत पुराने,
सुनते हैं आसमान में गाने.....
जाते हैं रोज नहाने,
और आते हैं रोज खाना खाने.....
एक हैं तारा,
कई सितारे......
लेखक मुकेश कक्षा अपना घर कानपुर

शनिवार, 7 अगस्त 2010

कविता वर्षा आयी

वर्षा आयी
वर्षा आयी वर्षा आयी |
बड़ी जोर से वर्षा आयी||
वर्षा जब आती हैं|
नाले भर -भर जाते हैं||
तीन दिन से झकझोर|
पानी आया जोर दर ||
साथ में अपने हवा न लाया |
वर्षा आयी वर्षा आयी||
नदी तालाब भर - भर जाये|
पानी से शहर बेहाल||
स्कूल जाने में क्या होगा हाल||
लेखक मुकेश कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

कविता: फैला दी अपनी लालिमा

फैला दी अपनी लालिमा

जग -मग जग-मग उगता सूरज ,
लेकर अपनी लाली मूरत....
तब पृथ्वी पर आती है छाया,
पृथ्वी पर फैला दी माया....
लाकर अपनी घन घोर छाया ,
चू -चू चिड़िया चह चहा रही है.....
लगता है जंगल में गाना गा रही है,
पेड़ पौधे सब मगन हो गये है.......
लगता है जंगल में बिस्तर डालकर सो गये,
मंद-मंद हवा बह रही है ......
कल- कल करके नदियाँ गीत गा रही है,
अपने उमंग में बही चली जा रही है......
जैसा लगता है शीतकाल आ गया हो,
वनस्पतियों को देखकर भविष्यकाल याद आ गया हो.....
जग -मग जग -मग उगता सूरज,
लेकर अपनी लाली मूरत.....
लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर, कानपुर

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

कविता हुयी बरसात

हुयी बरसात
झम झम झम |
चप्पल पहनकर निकले हम||
पानी बरसे तड तड|
ओले गिरते कण कण||
तालाब जाये भर भर|
मेडक बोले टर्र टर्र||
झम झम झम|
चप्पल पहनकर निकले हम ||
पानी का मजा खून लिया|
लेकिन पेड़ पौधों को कुछ नदिया||
पानी हमारा जीवन हैं|
इसके बिना दुनिया आजीवन हैं||
पानी को बर्बाद होने से हम बचायेगे|
पानी सबके लिए बहुत जरुरी हैं||
इसके बिना दुनिया आधूरी हैं||
लेखक मुकेश कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

कविता जब आयेगा तूफान

जब आयेगा तूफान
एक दिन आया एक तूफान ,
कर दिया सबको आनन फेन....
तूफान एतान्री जोर से आया था,
पेड़ पत्ती भी डगमगाया था....
तभी एक चिड़िया आयी,
उसने एक कहानी सुनायी.....
तूफान आया तो आने दो,
फल फूलो को गिर जाने दो....
नया वृक्ष बन जाने दो,
उससे छाया पायगे.....
खुशहाल जीवन बितायेगे,
वृक्ष अगर अधिक लगाओगे.....
पानी खूब बरसाओगे,
हरी भरी दुनिया बनाओगे....
स्वच्छ समाज का निर्माण करायेगे,
एक दिन आया एक तूफान.....
कर दिया सबको आमान फेन....
लेखक मुकेश कक्षा अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 28 मई 2010

कविता आइसर्कीम

आइसर्कीम
आइसर्कीम हमें ला दो ,
दो रूपया हमें दे दो.....
दो रूपया मै ले जाउगा,
बर्फ की सिली लउगा....
बर्फ मै बनाऊगा,
बाजार में बेचने जाऊगा.....
पैसा कामऊगा,
बर्फ की सिल्ली लाऊगा.....
सबको आइसर्कीम खिलऊगा ,
शरीर
में ताजगी लाऊगा...
आइसर्कीम मै खाऊगा.....
लेखक मुकेश कुमार कक्षा
अपना घर कानपुर

रविवार, 28 मार्च 2010

कविता पैसे का जमाना

पैसे का जमाना
पैसे का नाम बहुत पुराना है ,
महंगाई क जमाना है....
सब्जी कहाँ से लाना है,
मैंपैसा कहाँ से लाऊगा.....
अगर पैसा भी लाऊगा,
किन्तु सब्जी नहीं ला पाऊगा.....
देश में इतनी बढ़ गई महंगाई,
किन्तु अब रोटी खाई न गई.....
लोग कहते दाल रोटी से,
गुजरा चल जायेगा......
लोग कहने लागे नमक रोटी खाऊगा,
किन्तु पैसा कहाँ से लाऊगा.....
नमक भी महगा हो गया,
सरकार क बजट बढ़ गया....
और इंशान भूखा मर गया......
लेखक मुकेश कुमार कक्षा अपना घर