रविवार, 28 मार्च 2010

कविता पैसे का जमाना

पैसे का जमाना
पैसे का नाम बहुत पुराना है ,
महंगाई क जमाना है....
सब्जी कहाँ से लाना है,
मैंपैसा कहाँ से लाऊगा.....
अगर पैसा भी लाऊगा,
किन्तु सब्जी नहीं ला पाऊगा.....
देश में इतनी बढ़ गई महंगाई,
किन्तु अब रोटी खाई न गई.....
लोग कहते दाल रोटी से,
गुजरा चल जायेगा......
लोग कहने लागे नमक रोटी खाऊगा,
किन्तु पैसा कहाँ से लाऊगा.....
नमक भी महगा हो गया,
सरकार क बजट बढ़ गया....
और इंशान भूखा मर गया......
लेखक मुकेश कुमार कक्षा अपना घर

2 टिप्‍पणियां:

Shekhar kumawat ने कहा…

bahut sundar rachna he

shekhar kumawat

देशी जाट ने कहा…

भोजन करना छोङ दे तो शायद कुछ मेहगाई कम हो