शुक्रवार, 5 मार्च 2010

कविता -पुलिस न हुई किसी भाई

पुलिस हुई किसी भाई

एक चोर चार बन्दर ,
पाँचो गये जेल के अन्दर ......
चोर का नम्बर चार सौ बीस ,
एक सिपाही बोला चल मसाला पीस ......
एक बन्दर का नंबर एक सौ तीन ,
एक सिपाही जाकर बोला चल बजा बीन ......
दूजे बन्दर का नंबर सात सौ दस ,
एक सिपाही बोला ये रोज चलाएगा बस ......
तीजे बन्दर का नम्बर एक हजार ,
सिपाही बोला ये सब्जी लेने जायेगा रोज बजार ......
चौथे बन्दर का नंबर आठ हजार ,
एक सिपाही से बोला आओ बैठें यार ......
बन्दर बोला तू चोर मैं सिपाही ,
अदालत में देदो मेरी गवाही ......
हम सब हैं जंगल के भाई ,
तुमने हमको क्यों पकड़ा भाई ......
तब तक एक दरोगा आया ,
उसने चारो को अपने पास बुलाया ......
उसने पूछा कौन है चोर कौन है सिपाही ,
चारो बन्दर बोले हम है जंगल के राही ......
दरोगा बोला तुम हो सब साहूकार ,
जाओ हमने तुमको छोड़ा , हो जाओ फरार ......
दरोगा ने सिपाही से कहकर चोर को बुलवाया ,
उसे देख वह आश्चर्य में पाया......
क्योंकि वह चोर था दरोगा का पापा ,
दरोगा ने उसे देख अपने गले लगाया ......
गाडी मे बैठाकर उसको घर पहुंचाया,
पुलिस न हुई किसी की भाई ......
क्योंकि बाप को अपने जेल पहुँचाई ,
चार थे चोर चार थे बन्दर ......

लेखक :आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर