शनिवार, 13 मार्च 2010

कविता :हम सब बीमार पड़ते

हम सब बीमार पड़ते

जब- जब नाख़ून हुए बड़े,
गंदगी उसमें भरना शुरू हुयी ।
देखने में अच्छे न लगते,
सफाई ठीक से कर न पाते।
गन्दगी उसमें भरी रहती,
खाने के साथ में।
मुँह के अन्दर जाती,
अनेक बिमारी के लक्षण होते।
झट से हम बिमार पड़ते,
डाँक्टर के पास जब जाते।
डाँक्टर झट से दवा है देता,
नाख़ून काटने को साथ में कहता।
नाखुनो को हमेशा रखो साफ़,
बीमारी के समूह में।
कभी न हो तुम साथ,
जब जब नाख़ून हुए बडे,
तब तब बीमारी हुई हमारे साथ।

लेखक : अशोक कुमार
कक्षा :
अपना घर

2 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रेरक रचना ....

माणिक ने कहा…

नमस्कार
ब्लोगिंग की दुनिया में भरापूरा स्वागत करते हैं.आपके ब्लॉग पर आकर कुछ सार्थकता लगी है.यूहीं लगातार बने रहें और बाकी के ब्लोगों पर सफ़र करके अपनी राय जरुर लिखें.यही जीवन है.जो आपको ज्यादा साथियों तक जोड़ पायेगा.

सादर,

माणिक
आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से सीधा जुड़ाव साथ ही कई गैर सरकारी मंचों से अनौपचारिक जुड़ाव
http://apnimaati.blogspot.com
http://maniknaamaa.blogspot.com

अपने ब्लॉग / वेबसाइट का मुफ्त में पंजीकरण हेतु यहाँ सफ़र करिएगा.
http://apnimaati.feedcluster.com/