कविता :आशीष सिंह बाल कविताएँ बाल कहानियां बाल गीत किस्से कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कविता : अपनी भाषा को बढ़ाएं

 अपनी भाषा को बढ़ाएं 
अपनी भाषा दूर करे सबकी निराशा ,
सबके मन में एक ही आशा .....
मिल जुलकर सब रहें ,
धारा जैसे नदिया की बहें .....
कल-कल करे नदिया की धारा,
समुंदर का पानी है खारा ....
 समुंदर के पानी का रंग नीला-नीला ,
पानी के ऊपर बैठा था एक गुबरैला ....
हम सब मिलकर रहें या न रहें ,
नदियाँ की धारा जैसे क्यों बहें....
सब कोई अपना-अपना सोचते हैं ,
एक दूसरे को सब आपस में लूटते हैं  ......

लेखक : आशीष कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर  

गुरुवार, 11 मार्च 2010

कविता :काला कौआ गुस्से में भड़का

काला कौआ गुस्से में भड़का

एक था कौआ
एक था बउवा
कौआ रोता ,बउवा सोता
जब बउवा रोता ,तब कौआ सोता
एक दिन एक उल्लू आया
संग में अपने एक साड़ी का पल्लू लाया
उल्लू बोला ये लो साड़ी का पल्लू
बउवा के सिर पर डाल मेरे लल्लू
गुस्से में आकर कौआ बोला अबे उल्लू
निकल ले उठा के अपना साड़ी का पल्लू


लेखक :आशीष सिंह
कक्षा :
अपना घर

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

कविता -पुलिस न हुई किसी भाई

पुलिस हुई किसी भाई

एक चोर चार बन्दर ,
पाँचो गये जेल के अन्दर ......
चोर का नम्बर चार सौ बीस ,
एक सिपाही बोला चल मसाला पीस ......
एक बन्दर का नंबर एक सौ तीन ,
एक सिपाही जाकर बोला चल बजा बीन ......
दूजे बन्दर का नंबर सात सौ दस ,
एक सिपाही बोला ये रोज चलाएगा बस ......
तीजे बन्दर का नम्बर एक हजार ,
सिपाही बोला ये सब्जी लेने जायेगा रोज बजार ......
चौथे बन्दर का नंबर आठ हजार ,
एक सिपाही से बोला आओ बैठें यार ......
बन्दर बोला तू चोर मैं सिपाही ,
अदालत में देदो मेरी गवाही ......
हम सब हैं जंगल के भाई ,
तुमने हमको क्यों पकड़ा भाई ......
तब तक एक दरोगा आया ,
उसने चारो को अपने पास बुलाया ......
उसने पूछा कौन है चोर कौन है सिपाही ,
चारो बन्दर बोले हम है जंगल के राही ......
दरोगा बोला तुम हो सब साहूकार ,
जाओ हमने तुमको छोड़ा , हो जाओ फरार ......
दरोगा ने सिपाही से कहकर चोर को बुलवाया ,
उसे देख वह आश्चर्य में पाया......
क्योंकि वह चोर था दरोगा का पापा ,
दरोगा ने उसे देख अपने गले लगाया ......
गाडी मे बैठाकर उसको घर पहुंचाया,
पुलिस न हुई किसी की भाई ......
क्योंकि बाप को अपने जेल पहुँचाई ,
चार थे चोर चार थे बन्दर ......

लेखक :आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर

कविता - बाघ बचाओ

बाघ बचाओ
वन्य जीवों का पता लगाओ ,
सब मिलकर राष्ट्रीय "पशु " बाघ बचाओ
जंगलो को कटने से बचायें ,
जंगल जा -जाकर बाघों का पता लगायें
अब पूरे भारत में चौदह सौ ग्यारह बाघ बचे हैं ,
उनमें से आधे तो अभी बच्चे हैं
उन्हें बचाने के खातिर जंगल काटें ,
जगह -जगह पेड़ लगाने के लिए लोगों को बाटें
राष्ट्रीय पशु "बाघ" हम सब को बचना है ,
जंगलों को हरा-भरा और बनाना है

लेखक :आशीष सिंह
कक्षा :
अपना घर