मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शीर्षक : चोर

      चोर 
चार चोर की हुई सगाई ।
चारो थे आपस में भाई ।।
चारो एक दिन आये पास ।
ये आपस में थे उदास ।।
एक चोर ने एक बात बताई ।
बोल घर का खर्चा नहीं चलता भाई ।।
चारो हुए एक रात इकठ्ठा ।
बांध कर लाये अपना -अपना गट्ठा ।।
गट्ठे में भरा था  सामान।
रात में उनको दिखने लगा आसमान ।।
रात मे निकले अपने - अपने घर ।
रास्ते मे पुलिस चारो को लिया धर ।।
हो गया उन चोरों का खुलासा ।
टूट गई उनकी घर जाने की आशा ।।
नाम : ज्ञान कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर ,कानपुर 

शीर्षक : कुछ काम करो

   कुछ काम करो 
इस बार ठण्ड का आया मौसम ।
जिससे की सारा शहर गया सहम ।।
तूने न पहचाना , यह है तेरा भ्रम ।
सर्दी मे भी बोले हर -हर गंगे  हम ।।
सूरज न दिखता ,यह है तेरा है भ्रम ।
सर्दी में कोहरे का दिखता कोहराम ।।
सुन लो बच्चो , सुन लो तुम ।।
छुट्टी मे कर लो आराम ।
इतना भी न करना आराम ।।
किन कोई जन दे तुमको एक भी काम ।
कुछ काम करो और बन जाओ शाबाशी के लायक ।
जिससे कोई न कह पाए मक्कार , निकम्मा नालायक ।।
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

शीर्षक : हुई बहस

    हुई बहस 
हुई बहस ,
यह कैसी बहस ,
जिंदगीसे जुड़ी  बहस ,
राहों पर है खड़ी बहस ,
इन्तजार करती बस एक घड़ी ,
बहस हो खड़ी ,बहस से लड़ी ,
सुबह सो कर जल्दी उठने की पड़ी ,
न तो बहस हो जायेगी खड़ी ,
शाम नींदों से भरी ,
रात सोने की पड़ी ,
ये जिंदगी की घड़ी ,
हमको है जीने की पड़ी ,
हो हाथो में छड़ी ,
बहस दूर हो जाए कड़ी ,
नाम :हंसराज कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर , कानपुर 

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

शीर्षक: क्या इसके सिवा कोई काम धंधा नहीं

 क्या इसके सिवा कोई काम धंधा नहीं
भाई बहनों  नहीं के नहीं , बाप बेटी का रहा नहीं ।
हवस के इस दौर में , क्या- क्या नहीं ।।
दिल, जिगर , जज्बात सब बिक चुका है ।
बचाना नहीं इंशा नियत खत्म , हैवान जाग गया है ।।
सुरछित नहीं वो , जिसकी जेब मे पैसा नहीं  है ।।
कितनी दर्दनाक मौत हुई उन मासूमों की ।
फैसला जिसका आजतक हुवा नही।।
जानवर से बत्तर जिंदगी जीते हो ।
इंसानियत की राह पर क्यो चलते नहीं ।
क्यों इस राह पर चल पड़ते है लोग ?
क्या इसके सिवा कोई काम - धंधा नहीं
?
                                                                                                    dharmendra kumar
                                                                   class :9

                                                                   apna ghar ,kaanpur
                                                                                                

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

शीर्षक : ग्रामीण महिला और अधूरे सपने

        ग्रामीण महिला और अधूरे सपने 
एक अदद जहाँ घूमने की आजादी मिल जाए अगर ।
सपनो की दुनिया बसाने की एक राह मिल जाए अगर ।।
अपने न भी हो तो कम से कम अपनों का साया मिल जाए अगर ।
रिस्तो का परिवार न सही बस  जिंदगी जीने का एक बहाना मिल जाए अगर ।।
भूखे पेट को भोजन न सही कम से कम अन्न का एक दाना मिल जाए अगर ।
चार दीवारों का आसियान न हो बस रहने का एक  ठिकाना मिल जाए अगर ।।
रेशमी  कपड़ो का ताना  बना   न सही कम से कम तन ढकने को एक टुकड़ा कपड़ा मिल जाए अगर ।
सोना चांदी का आभूषण न हो बस एक चुटकी सिन्दूर का सहारा मिल जाय अगर ।।
दर्द से करहाती देह को दावा न सही कम से कम हाल पूछने वाला कोई मिल जाए अगर ।
मान सम्मान की माला न सही बस स्वाभिमान को जगाने वाला कोई मिल जाए अगर ।।
सुख सौंदर्य न सही कम से कम बहते आसुओ को पोछने वाला कोई मिल जाए अगर
एक अदद जहाँ घूमने की आजादी मिल जाए अगर ।
 सपनो की दुनिया बसाने की एक राह मिल जाए अगर ।।
नाम : के .एम भाई 
अपना घर , कानपुर 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

शीर्षक : रात हमारी

 रात हमारी 
अगर न होती रात हमारी ।।
हमको दिखता उजाला ही उजाला ।
अगर न होता सूरज दिन को ।
कैसे चमकता हमारा वातावरण ।।
पर्वत न  होते ऊँचे - ऊँचे ।
तो इसको पहाडो से बहाता  कौन ।।
 अगर न होती रात हमारी ।।
तो उजाला हमको दिखाता  कौन ।
रात को तारे चमकते है सारे  ।
दिखने में लगते चाँद सितारे ।।
नाम : जितेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर ,कानपुर 

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

शीर्षक : हो रहा विवाद है

    हो रहा विवाद है 
दूर कहीं एक स्थान है ।
जो देखने में पर्वत के सामान है ।।
वहां जाने का अनोखा विचार है ।
पर उस रास्ते में नहीं कोई इंसान है ।।
लोगों की इच्छा ने जाने की लालसा दी ।
इंसानियत की पहचान दी ।
हम जमाने  के इंसान ने ।।
विश्व में छोड़ दी अपनी परवाह ।
जहां देखो वहां इंसान है ।।
पर उसमे कोई इंसानियत की पहचान नहीं ।
देखने में बड़े प्रकृति वाद है ।।
करते हर दम अपवाद है ।
निकले न उसमे कोई सार ।।
बढ़ता और उसमे विवाद ।
दूर कहीं एक स्थान है ।
जहां विवाद  रहा विवाद है  ।।
नाम : अशोक कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर  

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

शीर्षक : बचपन

      बचपन 
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
जब हम खेले थे लुका -छिपी ।।
एक दूजे के मारते थे धप्पी ।
हमें अपने दे दूर करके ।
बचपन के सारे साथी भी गए ।।
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
बारिस से भरे गड्ढे - नालों में ।।
उस नाव पे बैठाते थे चीटे को हम ।
कागज की नाव बहाते थे संग -संग ।।
हमारी ये खुंशिया कौन ले गए ।
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
पतंगों की डोर सी अपनी कहानी ।।
बचपन की गलती है हमने मानी ।
फूलो सा खिलाना सिखाया था तुमने ।।
बचपन का गुसा भी  सहते गए ।
 ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए?
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 1
अपना घर ,कानपुर  

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

शीर्षक : स्त्री

           स्त्री
भारत की राजधानी दिल्ली में ।
घटी एक भयानक घटना ।।
पढ़ी - किखी समाज की लड़की को ।
उन दानव ने जिंदगी  कर दी बर्बाद ।।
वह लड़की जिंदगी मौत से कहरा रही है दिन -रात।
रात के दानवों ने आबरू छीन ली ।
और  अधेड़ स्त्री के भाँती सड़को में फेक दिया ।।
आखिर वह भी एक स्त्री है ।
वह भी एक माँ की बेटी  है ।।
जिन लोगों ने ऐसा काम किया ।
उनको गोली मार देनी चाहिए ।।
और सरेआम फांसी पर झुला देना चाहिए ।
नेताओं को केवल सुझाव देना आता है ।।
स्त्री की सुबिधा के लिए कोई काम करना नहीं आता ।
18 घंटो में दिल्ली मे होती है बालात्कार ।।
दिल्ली मे क्यों करते है दरिंदगी नहर चमत्कार ।
22 मिनट मे भी महिलाएं देश भर में नहीं है सुरक्षित ।।
आखित ये मंत्री नेता क्या करते है दिल्ली मे बैठे - बैठे ।
छोटे - छोटे मासूम बच्ची भी है हैरान ।
कुछ लोग है जो उनको दन रात करते है परेशान ।।
हमें ऐसे लोगों के मौत के घाट उतार देने चाहिए ।
ताकि देखा लोगों के रोंगटे खड़े हो जाए ।।
ताकि वह गलत काम करने से पहले एक बार सोचेगा ।
भारत की राजधानी दिल्ली में ।
घटी एक भयानक घटना ।।

नाम : मुकेश कुमार
कक्षा : 11
अपना घर .कानपुर

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

शीर्षक : सोचो फिर चलो

    सोचो फिर चलो 
पहले सोचो फिर समझो ।
फिर करने की ठानो ।।
ये कुदरत की कहानी है ।
हस करके तो देखो ।।
हिम्मत रखो करने की ।
पहले से क्यों डरते हो ।।
चलने से पहले उस पथ में ।
क्यो पीछे हटते हो ।।
कुछ नहीं है ।
हम में तुम में ।।
सब एक जैसी तो है ।
फिर क्यों नहीं चलते एक साथ ।।
कुछ तो है ।
आपस में भेद ।।
जो करने नहीं दे रहा भेट ।
 पहले सोचो फिर समझो ।
 ये कुदरत की कहानी है ।।
डर  कर के तो देखो ।
नाम : अशोक कुमार 
कक्षा :10
अपना घर , कानपुर 

रविवार, 16 दिसंबर 2012

शीर्षक : उसी पथ से गुजरना है

उसी पथ से गुजरना है 
आसान समझ कर देखो तो ,
हर पथ सरल है ,
उसमे चल के देखो तो ,
हर मोड़ पर पर्वत है ,
उसी मोड़ पर ,
एक और मोड़ है ,
उसमे भी पर्वत की दीवाल है ,
पर उनके लिए ,
हाथो में मजबूती की जरूरत है ,
वह मजबूती दिखाने की नहीं ,
किसी को डराने को नहीं ,
वह हाथो को हाथो मे ,
ल्र्कत चलने वाली है ,
जरूरत हमें इसी की है ,
फर्क खाली इतना है की ,
स्नेह और प्यार को चलना है ,
एक ही पथ से गुजरना है ,
हाथो को हाथो में ,
लेकर चलना है ,
नाम : अशोक कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर , कानपुर