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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

शीर्षक : चिड़िया का बचपन

    '' चिड़िया का बचपन ''
बचपन में मेरे आँगन में ।
एक चिड़िया आती थी ।
आँगन में बिखरे दानों को ।।
चुन - चुन कर खाती थी ।
बस ची -ची शोर मचाती थी ।।
बच्चा  बोल  मम्मी से ।
अम्मा आटे की बना के गोली ।।
दाना रोज चुगाती थी ।
यह भी चिड़िया भूखी है ।।
यह चोच फैलाकर आती है ।
मजबूरी है चिड़िया की ।।
वह दाना चुराकर लाती है ।
बछो के खातिर चिड़िया रानी ।
दाना लेकर आती है ।
डाला दाना चूजे के मुँह मे ,
वह मन ही मन मुस्काती है ।।
नाम : जीतेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर ,कानपुर 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

शीर्षक : रात हमारी

 रात हमारी 
अगर न होती रात हमारी ।।
हमको दिखता उजाला ही उजाला ।
अगर न होता सूरज दिन को ।
कैसे चमकता हमारा वातावरण ।।
पर्वत न  होते ऊँचे - ऊँचे ।
तो इसको पहाडो से बहाता  कौन ।।
 अगर न होती रात हमारी ।।
तो उजाला हमको दिखाता  कौन ।
रात को तारे चमकते है सारे  ।
दिखने में लगते चाँद सितारे ।।
नाम : जितेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर ,कानपुर 

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

शीर्षक :जो कली खिली बाग में ...

 "जो कली खिली बाग मे"

जो कली खिली बाग में ।
जों कली है समाज मे ।।
वह क्यों कुचल गई ।
फूल बनकर कली ने जग को महकाया ।।
क्यों कि फिर कली को समाज ने ठुकराया ।
फूलों का खिलान तो गले का हार होता है ।।
क्यों कि ये गले का फंद्दा बन गया ।
जिस कली का हार हो ये ।।
कली फूल बनकर सारे।
संसार को महकाएगी ।।
लेकिन कली को फूल बनाने का मौका तो मिले
तब तो वह कुछ करके दिखाएगी ।।
नाम : जितेन्द्र कुमार, कक्षा : 9, "अपना घर" ,कानपुर

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

शीर्षक : कितने बिगड़े बच्चे

      शीर्षक : कितने बिगड़े बच्चे
    कितने बिगड़े बच्चे सारे ,
   आपस मे टोलिया बनाते है। 
  कट्टा से गोली चलाते है ,।
  और  साधना कट बाल कटाते है। 
  और बेल बाटम की पैंट सिलाते ,
  और फैसन कोई न बच पाता ।
  महंगी वाली क्रीम लगाते ,
  और अपना चेहरा  साफ  दिखाते। 
  और खूब बॉडी स्प्रे लगाते ,
  छोटे -छोटे बाल कटवाते ।
  दाढ़ी ,मूंछे साफ  कराते ,
  जल्दी से पहचान न आते। 
  सिगरेट का वो धुआं उड़ाते ,
  फिल्म देखने रोज जाते ।
  रोज पुड़िया गुटखा खाते,
  और घर पर मारे जाते ।
  कितने बिगड़े बच्चे सारे,
नाम : जितेन्द्र कुमार 
कक्षा :9
अपना घर ,कानपुर