सोमवार, 24 दिसंबर 2012

शीर्षक : ग्रामीण महिला और अधूरे सपने

        ग्रामीण महिला और अधूरे सपने 
एक अदद जहाँ घूमने की आजादी मिल जाए अगर ।
सपनो की दुनिया बसाने की एक राह मिल जाए अगर ।।
अपने न भी हो तो कम से कम अपनों का साया मिल जाए अगर ।
रिस्तो का परिवार न सही बस  जिंदगी जीने का एक बहाना मिल जाए अगर ।।
भूखे पेट को भोजन न सही कम से कम अन्न का एक दाना मिल जाए अगर ।
चार दीवारों का आसियान न हो बस रहने का एक  ठिकाना मिल जाए अगर ।।
रेशमी  कपड़ो का ताना  बना   न सही कम से कम तन ढकने को एक टुकड़ा कपड़ा मिल जाए अगर ।
सोना चांदी का आभूषण न हो बस एक चुटकी सिन्दूर का सहारा मिल जाय अगर ।।
दर्द से करहाती देह को दावा न सही कम से कम हाल पूछने वाला कोई मिल जाए अगर ।
मान सम्मान की माला न सही बस स्वाभिमान को जगाने वाला कोई मिल जाए अगर ।।
सुख सौंदर्य न सही कम से कम बहते आसुओ को पोछने वाला कोई मिल जाए अगर
एक अदद जहाँ घूमने की आजादी मिल जाए अगर ।
 सपनो की दुनिया बसाने की एक राह मिल जाए अगर ।।
नाम : के .एम भाई 
अपना घर , कानपुर 

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (28-12-2012) के चर्चा मंच-११०७ (आओ नूतन वर्ष मनायें) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावी लेखन,
जारी रहें,
बधाई !!