शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

शीर्षक : उम्मीदों को छोड़ो

शीर्षक : उम्मीदों को छोड़ो
उम्मीदों को छोड़ो ।
हकीकत को मानो ।
पता को पहचानो ।
उस पथ  पर  चलाना सीखो ।
खुद की उमीदो को छोड़ो ।
 बात मानो तो ,
खुद को पहचानो ।
न मिले कोई तो ,
अकले ही चल दो ।
थोडा कष्ट  होगा जरूर ।।
लेकिन पता को पहचान होगी ।
चलने का अनुभव होगा ।।
न  भोजन हो तो भी ।
जल से भूख मिटा लेंगे
हिम्मत करके ।
कुछ करके देखे ।
जो होगा ।।
उसका झेलेंगे ।
लेकिन उम्मीदों को ,
न छोड़ेंगे ।।
इस जग मे भूखे ही ।
 सो लेंगे ।
नींदों को छोड़ेंगे ।।
न मिलेगा इंसान तो ।
पौधों को ही मित्र बना लेंगे ।।
इस धरती को ।
अनंत सा बना   देंगे ।।
 उम्मीदों को छोड़ो ।
 हकीकत को मानो
  नाम : अशोक कुमार
कक्षा 10
अपना घर ,कानपुर 

 

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-12-2012) के चर्चा मंच-१०८८ (आइए कुछ बातें करें!) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

रश्मि ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्‍तुति

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुंदर कविता अशोक. इसी तरह आगे ही लिखते रहो.