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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

''किस किस की सुरक्षा ''

''किस किस की सुरक्षा ''
मुकेश अम्बानी जैसे उद्योगपति ,
खतरे से नहीं है खाली 
सरकार हमारी दे रही गाली । 
उनकी सुरक्षा के  लिए सी .आर .पी .ऍफ़ बल शाली ॥ 
सरकार को चिंता है तो पैसे वालो की ,
भाड़ मे  जाए दुनियादरी ,
लूट रही है जिसकी आबरू ,
वो है इस जंहाँ की सारी नारी 
नारी की सुरक्षा करना ,
उन पर हुए जुल्म का ,
उनको इन्साफ दिलाना ,
दायित्व हमारी सरकार का । 
ऐसा क्या बात है अम्बानी मे ,
जो उन्हें सुरक्षा देने  की तैयार ,
 सुरक्षा देना है तो सबको दो ,
मजदूर ,किसान हो बेरोजगार जनता सारी ,
 सारे उद्योग - धंधे चलते है ,
मजदूरों के बल पर ,
कृषि करे किसान भईया ,
बिना सुरक्षा अपने दम पर ,
ऐसा नहीं न होना चाहिए ,
सबको एक सामान अधिकार चाहिए ,
चाहे वह हो पैसा वाला ,
या हो वह मजदूरी  करने वाला  ,
सवाल हमारा यही है ,
हम इसको ही दोहराए ,
किस -किस की सुरक्षा की जाए ,
यह सरकार हमें बताये । 
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा :१ १ 
अपनाघर , कानपुर 


शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

शीर्षक : ठंडी

              "ठंडी"
इस बार ठण्ड का आया मौसम ।
जिससे की सारा शहर गया सहम ।।
तूने न पहचान ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में बोले हर -हर गंगे हम ।।
सूरज न दिखता , ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में कोहरे का कोहराम ।।
सुन लो बच्चो सुन लो तुम ।
छुट्टी में कर लो आराम ।
इतना भी न करना आराम ।।
कि कोई न दे तुमको काम ।
कुछ काम करो और हो जाओ लायक ।
जिससे न कहा पाए कोई मक्कार , निक्कमा ,नालायक !
नाम : आशीष कुमार, कक्षा 10, अपना घर, कानपुर  

शीर्षक : स्त्री

            " स्त्री "
एक स्त्री जिसने समाज को बनाया ,
आज उस स्त्री को महत्व ,
लोगों की समझ से परे है ,
क्योंकि लोगों नहीं समझ रहें सामाजिक तत्व ,
की स्त्री वाही नारी है ,
जिसकी गोद मे खेली दुनिया सारी ,
आखिर कब तक सहे वह जुल्म ,
मानव कर रहा दिन प्रति -दिन जुर्म ,
तुम्हे है इतनी बेशर्मी ,
फिर भी बैक स्त्री को ही कहते मम्मी ,
तुम्हारे घर में भी है माँ - बहन ;
यदि उनका करे कोई बलात्कार और लुटे गहने ,
फिर बोल क्या करोगे ?
क्या  इसी तरह के स्त्री पर हो रहे जुलम सहोगे ,
क़ानून तो केवल है अँधा ,
केस मुकदमे चलाना यह है एक धंधा ,
देश मे इतने सारे है क़ानून ,
पानी के भाव बह रहा है खून ,
इतनी है सुरक्षा और  सैन्य बल ,
जिससे हर समस्या हो सकती है हल ,
इस देश की व्यवस्था को चलाने वाले ,
कर दो इन सब के मुंह काले ,
धन -दौलत के चक्कर में हो गए है अंधे ,
लूटमार , बलात्कार ,करना हो गए है रोज के धंधा ,
लक्ष्मी बाई और दुर्गावती के जैसे ,
यदि बन जाए हर स्त्री वैसे ,
तो इस देश से कतम हों जायेंगे जुल्म साते ,
फिर ना बच पायें लूटमार बलात्कार के हत्यारे ,
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपनाघर कानपुर 

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शीर्षक : कुछ काम करो

   कुछ काम करो 
इस बार ठण्ड का आया मौसम ।
जिससे की सारा शहर गया सहम ।।
तूने न पहचाना , यह है तेरा भ्रम ।
सर्दी मे भी बोले हर -हर गंगे  हम ।।
सूरज न दिखता ,यह है तेरा है भ्रम ।
सर्दी में कोहरे का दिखता कोहराम ।।
सुन लो बच्चो , सुन लो तुम ।।
छुट्टी मे कर लो आराम ।
इतना भी न करना आराम ।।
किन कोई जन दे तुमको एक भी काम ।
कुछ काम करो और बन जाओ शाबाशी के लायक ।
जिससे कोई न कह पाए मक्कार , निकम्मा नालायक ।।
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर 

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

शीर्षक : बचपन

      बचपन 
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
जब हम खेले थे लुका -छिपी ।।
एक दूजे के मारते थे धप्पी ।
हमें अपने दे दूर करके ।
बचपन के सारे साथी भी गए ।।
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
बारिस से भरे गड्ढे - नालों में ।।
उस नाव पे बैठाते थे चीटे को हम ।
कागज की नाव बहाते थे संग -संग ।।
हमारी ये खुंशिया कौन ले गए ।
ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए ?
पतंगों की डोर सी अपनी कहानी ।।
बचपन की गलती है हमने मानी ।
फूलो सा खिलाना सिखाया था तुमने ।।
बचपन का गुसा भी  सहते गए ।
 ओ मेरे बचपन कहाँ तुम गए?
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 1
अपना घर ,कानपुर  

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

शीर्षक : कुत्ता
काश मै भी सेठ जी का कुत्ता होता ।
तो हमारे मजे ही मजे होते ।
सुबह - सुबह बाइक मे बैठ कर ।।
करता मै भी सैर ।
खाने को मिलता माखन , बिस्कुट ,
प|नी मे होता ताजा दूध ।
खुल जाते भाग्य  हमारे ।।
यदि सेठ के कुत्ते होते हम बेचारे ।
सर्दी की तो बात निराली ,
एक बढ़िया सा होता मेरा बिस्तर ।।
जिस पर  सोता,बैठता ,लेटता ।
सबकी जुंबा पर एक ही पुकार ।।
कोई कहता नीलू ,
तो कोई कहता पीलू ,
तो प्यार से बोलता डॉगी,
तो किसी की  जुंबा पर होता मैगी ।।
न पढ़ना पड़ता न कुछ ,
बैठ - बैठ मिलता सब कुछ ।
यदि मौका मिले तो न चून्कू ,
सेठ के दुश्मन पर बड़े जोर से भौकूँ।

नाम : आशीष कुमार
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

शीर्षक : कवि की छवि

   "कवि की छवि" 
 
एक था बहुत बड़ा कवि ।
जब हमने देखी उसकी छवि ।।
उड़ गए होश हमारे ,
गश खाकर हम गिरे,
देख के हमको दौड़े लोग बेचारे ।
मै तो था बेहोश ,
पानी ही पड़ते हमको आया होश ।।
कवि ने पूछा अरे ओ भईया ,
हमने बोला क्या रे कविया ?
सुनकर हमारी ये बतियाँ ,
कवि के गुस्से से लाल हो गई अँखियाँ ।
काले बादलो की भाँती मेरे पास में छाया ,
उसका यह रोब हमरे मन को भाया ।
हमने कहा अरे ओ भईया ,
सुन लो तनि हमरी ये बतिया ।
हमने सुना था  कि तुम हो शांत रस के कवि ,
तो शान्ति के जैसी होगी तुम्हारी छवि ।
पर तुम तो निकले रौंद्र रस के कवि ,
तुमने बदल दी हमारी छवि ।।
नाम : आशीष कुमार , कक्षा : 10, अपना घर ,कानपुर 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

शीर्षक : काम ही काम

"काम ही काम"

तू किस सोच मे डूबा है ।
अब तो सोच अपनी बदल ।।
वरना चला जाएगा यह समय ।
तू अपने को न बदल पायेगा ।।
हाथ है तेरे स्वतंत्र ।
फिर भी तेरा मन है परतंत्र ।।
फिर भी अपने के वास्ते ।
तू खुद  को कर स्वतंत्र।।
तुझे पता नहीं है तू है न फूलो सा राजा ।
जो जब मन आये बैठे कर ली आराम ।।
आराम तेरे लिए है हराम ।
अब  तुझे करना है  बस  काम ही काम ।।

नाम : आशीष कुमार , कक्षा : 10, अपनाघर , कानपुर

शनिवार, 10 नवंबर 2012

शीर्षक : समय

 " समय"

उस समय की बात है ।
जब वक्त था सोने का ।।
सूनसान हो गया था ,सारा महौल ।
मन  तो चंचल  होता ही है ।।
कुछ करने को जी करता है ।
किसी तरह से मन को रोक पाया ।।
तब उसको कुछ अच्छा करने को भाया ।
लिया कलम कापी का सहारा ।।
उनके आगे भी वह हारा ।
धोखा दे दिया पेन ने उसका ।।
इतने मे वह बड़े जोर से बमका ।
गलत नहीं थी पेन की कोई ।।
सर्दी से इंक थी उसकी जम  गई ।
तब तक सब जाग गए थे उसके शोर से ।।
बूढ़े ,बच्चे ,युवा सभी चिड़िया के शोर से ।
 नाम : सागर कुमार , कक्षा: 9, अपना घर ,कानपुर

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

शीर्षक : योगी

शीर्षक : योगी 
अवसर मिले करो प्रयोग ,
चाहे वह क्यों न हो योग ।
 योग के करने से भी बढ़ी हैं कई चीजे  ,
चाहे हो मानसिकता की बीमारी ।
ख़तम हो जाये इससे बीमारी सारी ,
क्योंकि योग करने से बढती है कई चीजे ।
यदि योग की साधना करली पूरी ,
तो आ जाएगी तुम्हारे अंदर श्रद्धा और सबूरी ।
श्रद्धा से है जीना जरूरी ,
बुरे समाज के लोगो से बचना अति जरूरी ।
अब के हर बालक, युवाओं के मुँह  पर  है गाली ,
एक हाथ से बजे न कभी भी ताली ।
ये है सब एक तरह के रोगी ,
इनसे बचना है तो बन जा योगी ।
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर कानपुर      

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

शीर्षक : चुटकुला

    शीर्षक : चुटकुला
 पहला व्यक्ति :यार मुझे पंडितो से
 बहुत ही नफरत होती है ,
 और  बहुत गुस्सा आता है ।
 लगता है कि पेट्रोल डालकर आग लगा दूँ
 दूसरा  व्यक्ति: तो फिर सबसे पहले तू अपने
 आप को आग लगाकर फूंक ले ।
 पहला व्यक्ति: क्यों?
 दूसरा  व्यक्ति: क्यों कि तू खुद भी तो पंडित है
 पहला व्यक्ति: :यार मुझे आत्महत्या करने से दर लगता है ।
नाम :   आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

शीर्षक :मन

      शीर्षक :मन
 जो कहता है तू कह दे ।
 तू न डर किसी से ,
 जो बहकावे तुझको ।
 मत आना उसके बहकावे मे ,
 सोच के अपने मन मे ।
 करले पक्का वादा मन में ,
 कठोर बनने दे अपने को ।
 न  बहके   रोक ले अपने  मन को ,
 मन बड़ा ही चंचल ।
 मन बहके तो मच जायेगी हल -चल ।
 यदि मन को रखेगा ठान के ,
 तभी तो आगे बढ़ पायेगा सीना तान के ।
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर