रविवार, 15 अप्रैल 2012

कविता :-बात

बात 
बात ही बात में.... 
हो गई जूता लात,
एक नें मारा दो जूता....
दूजा बोला तू है कुत्ता,
सुनकर झगडा आ गया....
कुत्ता बोला अरे ओ भईया,
हमनें आपका क्या किया....
जो आपनें हमें कुत्ता कह बुलाया,
एक नें बोला इसनें आपका मजाक उड़ाया....
कुत्ता कह आपको खूब गरियाया,
कुत्ते नें सुन अपनी बुराई....
एक दूजे पर झपट पड़ा भाई,
नाम :-जमुना कुमार 
कक्षा :-6 
अपना घर  

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कविता :-बात

बात 
चलो चलो...
करते हैं कुछ छुप छुप के बात,   
कैसे कटती है यह रात....
करते हैं कुछ ऐसी बात,
बात भी क्या बात है....
समझने में कुछ खास है,  
यह संसार बात से बना....
बात में कुछ खास नहीं,
बात बिलकुल बेकार है....
जिसको सुनने को कोई नहीं है तैयार,
चलो चलो....
करते हैं कुछ छुप छुप के बात, 
 नाम:-अशोक कुमार
कक्षा :9 
अपना घर
 
 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

कविता :-इस वर्ष

इस वर्ष 
जब चला था मैं....
घर से निकलकर,
तो देखा आगे थोड़ी दूर चलकर....
एक गाय के बच्चे की लाश पड़ी थी,
उसको खाने की ताक में....
आस पास कई कुत्ते खड़े थे,
अगर ऐसा होता रहा....
इस वर्ष की ठंडी में,
तो नहीं हो पायेगा भण्डारण....
दूध का दूध की मंडी में, 
नाम :-ज्ञान कुमार 
कक्षा :-8 
अपना घर 

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

कविता : चीटीं रानी

चीटीं रानी
चीटीं रानी चीटीं रानी....  
चिंता में क्यों पड़ी हो,
कण-कण जोड़-जोडकर हरदम....
रात दिन करती हो श्रम,
कभी नहीं करती आराम....
सबसे मिलकर रहती हो,
गर्मी जाड़ा हरदम सहती हो....
हम भी मेहनत करना सीखे,
हिल मिल कर हम रहना सीखे....
चीटीं रानी चीटीं रानी,  
चिंता में क्यों पड़ी हो.... 
नाम :जीतेन्द्र कुमार 
कक्षा :8 
अपना घर

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

बेजुबान जानवर

बेजुबान जानवर 
क्या आप इन बेजुबानो....
को सुन  सकते है,
क्या आप इनकी भलाई....
में कुछ कर सकते हैं,
क्या है इनकी आशा....
इन भले इंसानों से,
क्या आप समझ सकते....
हैं दर्द बेजुबानों के ,
ये बेजुबान जानवर....
कुछ बोल रहे है,
इनकी बातों को क्या....
आप सुन रहे हैं,
दिन पर दिन बड़े-बड़े....
जंगल क्यों काटे जा रहे,
इन बेजुबान जानवरों के....
घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं,
पल-पल क्षण-क्षण....
अब ये घटते जा रहे,
मनुष्य जैसे इस दुनिया में....
अत्याचारी बढते जा रहे,
मरे जा रहे हैं जानवर....
बनाये जा रहे हैं बंदी,
आज कल इनके लिए भी....
उपलब्ध है सुविधा चकबंदी,
अब इनकी सुविधा के लिए भी....
अपने हाथ बढाओ,
इस हरियाली हीन धरती पर....
बेजुबानों की दुनिया बसाओ,
इनकी भलाई तुम करो....
तो जरा मन से,
कैसा हो रहा है महसूस....
पूछ कर तो देखो इनसे,
मन ही मन दे रहे होंगे....
ये बेजुबान दुआएं,
शब्दों को नहीं इनकी भावनाओं को....
समझने का कष्ट उठायें,
लेखक :-सोनू कुमार 
कक्षा :-10 
 अपना घर

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

परीक्षा

परीक्षा 
परीक्षा का है ये समय....
याद नहीं अब कुछ होता,
दिन रात जो है रटते रहते....
हैं कहलाते वो रट्टू तोता,
जो दिन भर रटते रहते....
परीक्षा में हैं सब भूल जाते,  
यही एक बड़ा कारण है....
परीक्षा में है नम्बर कम आते,
हर चीज को तुम समझो....
फिर न भुला पाओगे कभी,
हर चीज जो समझ में आयेगी....
अच्छे नम्बर आएंगे तभी,
लेखक :-धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा :-9 
अपना घर 

रविवार, 8 अप्रैल 2012

बसंत ऋतु

बसंत ऋतु
बादल आ गए फिर....
पानी भर कर अपने अंदर,  
रात में था खूब उजाला....
सुबह दिखा आसमान सिर्फ काला-काला,
फिर तो चली हवा-हवाई....
खेतों में सरसों लहराई,
पक्षी उड़े हैं बिना लगाये जोर....
चारों ओर मचा है सर्दी का शोर,
सभी पौंधो में लगी है डाली.... 
किसने पौंधो के पत्ते किये खाली,
फिर बादल जोर-जोर से गरजा....
मम्मी बोली बेटा जल्दी सो जा,
बरसा पानी बहे सभी नाले नाली....
फिर देखा तो पौंधो में कोपें निकली,
देख कर ये सौन्दर्य नजारा मेरे में को भाया....
क्योंकि अब बसंत ऋतु का मौसम आया,
लेखक :-आशीष कुमार 
 कक्षा :-9 
अपना घर   

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

विद्यार्थी

कविता : विद्यार्थी

एक विद्यार्थी....
जो है बड़ा स्वार्थी ,
और एक विद्यार्थी....
जो है सबका सार्थी ,
विद्यार्थी जीवन....
जिसमें बिता सारा बचपन ,
ये पीढ़ी है प्रथम श्रेणी....
कहीं सुलभ है तो कहीं दुर्लभ  ,
इस श्रेणी का है जो मुकाम....
मत होना ऐ तू नाकाम ,
ऐ विद्यार्थी ....
तू न बन स्वार्थी
नाम :आशीष कुमार 
 कक्षा :9 
अपना घर,    

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

कविता : संसार

 संसार 
ये दुनियाँ कैसी,
कोई मोटा तो,कोई पतला.....
कोई अमीर तो,कोई गरीब ,
कोई पढ़ा लिखा तो,कोई अनपढ़....
जो भी जीवन में संघर्ष किया है ,
ओ अपने लक्ष्य को पा लिया है ...... 

लेखक : चन्दन कुमार 
कक्षा : 6
अपना घर   

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

कविता : गर्मियों की छुट्टियाँ

 गर्मियों की छुट्टियाँ

अब आने वाली हैं ,
गर्मियों की छुट्टियाँ...
अब लिखने में मजा आयेगा,
भइया-दीदी को चिट्ठियाँ....
गर्मियों में करेगें खूब मस्ती,
घूमेगें हर शहर,गाँव और बस्ती .....   
गर्मियों में खेलेगें खूब क्रिकेट ,
और लेंगे खूब सारे विकेट .....
बस थोड़ा सा इन्तजार है ,
चार पेपरों को करना पार है ......
साथ में करते रहेगें थोड़ा पढ़ाई ,
क्योंकि आगें है बहुत लड़ाई....

लेखक : ज्ञान कुमार 
कक्षा : 8
अपना घर    

रविवार, 1 अप्रैल 2012

कविता : सब कुछ खो गया

 सब कुछ खो गया


पंक्तियों की खोज में ,
शरारतें ही खो गयीं....
शरारतें खो जाने से ,
बचपन भी खो गया ....
इन सब के खोने से ,
मुस्कराहट ही चली गयी....
मुस्करानें का मन किया ,
लेकिन मन की चाहत खो गयी ....
पंक्तियों की खोज में ,
सारा संसार ही खो गया....


लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर