सोमवार, 8 जून 2009

कविता: गर्मी का मौसम

गर्मी का मौसम
गर्मी का मौसम है आया।
शरीर पसीने से है थरार्या
दोपहर में बड़ी जोर।
चलती है लू घनघोर॥
धूल मिट्टी सर-सर कर।
जाती है अपने घर॥
दोपहर को कड़ी धूप में
बाहर जाता हूँ मुश्किल में॥
ठंढे पानी में मजा है आता।
गर्मी को है दूर भगाता॥
गर्मी का मौसम है आया।
शरीर पसीने से है थरार्या॥
कविता: अक्षय कुमार, कक्षा , अपना घर

रविवार, 7 जून 2009

कविता: धोबी और लोहार

धोबी और लोहार
एक गधे पर चार सवार
उसमें दो धोबी और दो लोहार
घूम - घाम के सब पहुचें मंडी
दोनों धोबी ने खरीदी भिन्डी
दोनों लोहार को गुस्सा आया
दोनों ने दो दर्जन केला खाया
गधे को धोबी ने खिलाया ककड़ी
ककड़ी में छिपी थी काली मकड़ी
गधे की गर्दन में मकड़ी ने बुना जाल
गधे जी दर्द के मारे हुए बेहाल
गधे को देखकर चारो का हुआ बुरा हाल
पाँव उठाके भागे और पहुच गए ननिहाल
कविता: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर


शनिवार, 30 मई 2009

कहानी: मछुआरे और नेवले कि दोस्ती

मछुआरे और नेवले कि दोस्ती
एक समय की बात है कि एक मछुआरा मछली मारने के लिए जाल लेकर अपने घर से नदी की ओर चला, चलते- चलते रास्ते में उसे एक बडा सा सांप मिला, वह सांप बहुत काला और खतरनाक था वह सांप रास्ते में खड़ा हो गया और बोला कि मैं तुम्हें काटूगा इतने में मछुआरे ने कहा कि मैंने आपका क्या बिगाडा है, जो आप मुझे काटेगें सांप ने कहा मैं भूखा हूँ और मुझे कुछ खाने को चाहिए मछुआरे ने कहा ठीक है जब मै मछली मारकर वापस आऊंगा , तब मैं आपको मछली दूंगा, आप उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेना सांप नें कहा कि अगर मछली मिली तो मैं तुमको काट लूँगा मछुआरे नें कहा कि ठीक है, तो जाओ और जल्दी वापस आना, सांप ने कहा जब मछुआरा वहां से थोडी दूर बढ़ा तो उसने देखा कि एक नेवला प्यास की वजह से चल नहीं पा रहा है तो उस मछुआरे को दया गई, उसने नेवले को उठाया और पहुंच गया नदी के पास ,वहाँ जाकर नेवले को मछुआरे ने पानी पिलाया और चुप चाप एक जगह पर जाल लगाकर बैठ गया नेवले ने पूछा कि क्या बात है तुम इतने उदास क्यों हो मछुआरे ने सारी बात बता दी नेवले ने कहा कि तुम चिंता मत करो सब कुछ ठीक हो जाएगा, जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम्हें कुछ नहीं होगा मछुआरे को वहाँ जाल से एक भी मछली नहीं मिली, अब मछुआरा बहुत उदास हुआ नेवले ने कहा कि तुम घर कि ओर चलो और मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ मछुआरे ने नेवले को अपनी पोटली में रख लिया और घर कि तरफ़ चल दिया, थोड़ी दूर चलते ही वहीं साँप रस्ते में मिला और वह फुंफकारते हुए बोला कि मछलियाँ कहाँ हैंमछुआरे ने पोटली खोलकर नेवले को बाहर निकाल दिया नेवला पोटली से निकलते ही साँप पर टूट पड़ा, नेवले और सांप में खूब लड़ाई होने लगी सांप को काफी चोट भी लग गई सांप वंहा से जंगल कि तरफ़ भाग निकलामछुआरा नेवले को अपने साथ घर ले गया और इस प्रकार से घर में सही सलामत पहुच कर मछुआरे और नेवले ने साथ में कहना खायाइस प्रकार से मछुआरे और नेवले में पक्की दोस्ती हो गईअगले दिन से दोनों दोस्त साथ में मछली मरने जाने लगे
कहानी: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

गुरुवार, 28 मई 2009

सम्पादकीय: १७ मई 2009

प्यारे दोस्तों
"बाल सजग" अच्छे से चल रहा है। हमें उम्मीद है की हमारे बाल सजग की कविता और कहानियाँ लोग बराबर पढ़ रहे है। पाठकों के हौसला अफजाई संदेश हमें बराबर मिल रहे है जिससे हमें और ज्यादा लिखने की प्रेरणा मिल रही है। इस बार बाल सजग में पेंटिंग बहुँत ही कम लगी, यह हम सभी की गलती है । हम कोशिश करे की बाल सजग को और बेहतर बनायें, हम सभी को और मेहनत करनी चाहिए। अभी लोक सभा का चुनाव ख़त्म हुआ और कांग्रेस भारी मतों से जीती है अब फ़िर से कांग्रेस की सरकार भी बन जायेगी। हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी को काम करते हुए ५ साल हो चुके है अगले प्रधानमंत्री फ़िर से मनमोहन सिंह जी होंगे। शायद हमारे देश की जनता सोचती है की राजनीतिक पार्टिया अच्छा काम करती है, तभी तो वो उन्हें जिताकर संसद में भेजती है। मगर मुझे नही लगता है की राजनितिक पार्टिया और ये नेता अच्छा काम कर रहे है, वो तो जनता को लूटने में लगे है, उनसे बेहतर तो समाज सेवक और निर्दलीय लोग अच्छा काम कर रहे है। पार्टी सिर्फ़ अपने हित के लिए सोचती है मगर समाज सेवक तो देश और आम जनता के लिए सोचते है। हमारे देश में अगर कोई समाज सेवक किसी ग़लत बात का विरोध करता है तो जनता उसका साथ नही देती है, मगर राजनीतिक पार्टी के लोग ग़लत भी करे तो जनता उनका साथ देती है और अपने घर ले जाकर शरबत, चाय पिलाती है। सरकारी कार्मचारी भी उन्ही राजनीतिज्ञों की सुनते है। मगर हमें इस व्यवस्था को बदलना होगा और ये तभी होगा, जब आम जनता चेतेगी और इस गन्दी राजनीति को साफ करके अच्छे लोगों को चुनकर संसद में भेजेगी.....
१७ मई २००९
संपादक: अशोक कुमार, कक्षा ६, अपना घर
उप सम्पादक: ज्ञान कुमार, कक्षा ५, अपना घर
बाल सजग
अपना घर
बी० -१३५/८, प्रधान गेट, नानाकारी
आई० आई० टी० , कानपूर -२०८०१६
फोन: ०५१२-2770589

कविता: एक तालाब पर बैठा बगुला

एक तालाब पर बैठा बगुला॥
अपना ध्यान पानी लगाये।
मछली उछले उसको लपकूं॥
ये उसके मन में विचार आए
तभी एक केकड़ा पहुचाँ॥
झट उ़सने बगुले को दबोचा।
तब बगुले को समझ में आया॥
अ़ब करूँगा कभी शिकार।
तब केकड़े ने उसको छोड़ा
छूटते ही बगुले ने भर ली उड़ान।
और जा पहुँचा आसमान
कविता: ज्ञान , कक्षा 5, अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर


कविता: जल है जीवन

जल है जीवन
जल है मेरा जीवन
क्या इसके बिना जीवन
सदा साफ जल को ही पिए।
खूब जीवन लम्बी जिए॥
सबकी प्यास बुझाता जल।
तन की थकान मिटाता जल॥
जल को बर्बाद करे हम।
जल को बचाए मिलकर हम॥
जाने कितने को देता है जीवन।
इसके बिना बेकार है जीवन॥
जल है मेरा जीवन।
इसके बिना क्या जीवन
कविता: मुहम्मद चंदन तिवारी, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 26 मई 2009

कविता: पेड़.

पेड़
पेड़ है देखो कितने प्यारे।
ये तो है सबसे न्यारे ॥
पेड़ के सहारे सब जीते है।
पंछी तेरा रस पीते है ॥
फल को खाकर हम जीते है ।
छाँव में तेरे सुख पाते है ॥
तुम तो हो स्वपोषी ।
जीते तुमसे परपोषी ॥
तुमसे बहती जीवन की धारा ।
तुम तो हो जीवन का तारा ॥
तुमको हमें बचाना है ।
पेड़ों को खूब लगाना है ॥
कविता: सागर कुमार, कक्षा ५, अपना घर

कविता: टेलीफोन

टेलीफोन
कितना अच्छा है टेलीफोन।
बातचीत का साधन टेलीफोन
दूर - दूर से बाते होती
जाने कैसे आवाज पहुँचती॥
सोच - सोचकर यही पछताता।
कैसे टेलीफोन बातें करवाता
टेलीफोन एक ऐसा रस्ता।
जोड़े एक दूजे का रिश्ता॥
इसमे है रुपये का खर्चा।
तभी तो है टेलीफोन का चर्चा

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर


शनिवार, 23 मई 2009

कविता: पानी जीवन का गहना

पानी जीवन का गहना
बादल गरजा गड़ - गड़ - गड़
बिजली चमकी चम - चम - चम
पानी बरसा टप - टप -टप
मेढ़क कूदा छप - छप - छप।।
हम सब भीगे पानी में
पानी भागे नाली में ।।
पानी को हमें बचाना है
पेड़ों को खूब लगना है
पानी को इकठठा करके रखना
जल ही है जीवन का गहना
कविता: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर

बुधवार, 20 मई 2009

कहानी: बाग की परियाँ

बाग की परियाँ
पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव, जिसका नाम सुन्दरपुर था । मानस और उसका परिवार उसी गाँव में रहते थे, माँ जब पहाड़ों पर जंगल से लकड़ी बीनने जाती तब मानस भी माँ के साथ बकरियों को लेकर पहाड़ पर चराने जाया करता था। उस गाँव के पास दूसरे पहाड़ पर एक बहुत ही सुंदर बगीचा था। मानस उस बगीचे में घूमने और फल खाने जाया करता था, कभी - कभी तो रात को भी उस बगीचे में घूमने चला जाता था। एक बार उसकी माँ ने कहा बेटा उस बगीचे में रात को मत जाया करो, वहां पर रात को परियां नाचने आती है। मानस ने कहा माँ तुम चिंता मत करो मुझे परियों से डर नही लगता , परियां अगर कभी मुझसे बगीचे में मिल गई तो मै उनके साथ खूब खेलूँगा और नाचूँगा भी। माँ के लाख मना करने के बाद भी मानस बगीचे में जाना नहीं छोड़ा। वो हमेशा दिन रात उन परियों के बारे में सोचता रहता। एक दिन घर के सभी लोग रात को गहरी नींद में सो रहे थे, मानस अपने बिस्तर से उठा और चुपके से बगीचे की तरफ़ चल दिया। बगीचे में दूर से रौशनी दिख रही थी, मानस और तेजी से बगीचे की तरफ भागा। बगीचे में पहुच कर मानस ने देखा की सफ़ेद रौशनी में गुलाबी, सफ़ेद, नीली, पीली, लाल और कई रंग की कपड़े पहने सुंदर - सुंदर परियां नाच रही है। मानस भी उनके साथ नाचने लगा, कुछ देर में परियों ने नाचना बंद कर दिया। सभी परियां मानस को चारो तरफ़ से घेर कर खड़ी हो गई, और उसके बारे में पूछने लगी। मानस और परियों में आपस में खूब दोस्ती हो गई। परियों ने कहा मानस अब हम लोग सात पहाड़ों के पार फूलों की घाटी में नाचने जा रही है तुम भी चलोगे क्या ? मानस ने कहा मै कैसे जा सकता हूँ मेरे पास तो पंख ही नहीं है। मानस का मन उदास हो गया, मानस को उदास देख कर लालपरी ने अपनी जादू की छड़ी से मानस की पीठ को छुआ, जादू की छड़ी को छूते ही मानस के पीठ पर सुंदर से पंख उग आए। मानस सभी परियों के साथ फूलों की घाटी की तरफ़ उड़ चला। फूलों की घाटी में मानस और परियों ने खूब नाचा, मानस नाचते - नाचते अब थक गया था। मानस परियों से बिदा लेकर अपने घर की तरफा उड़ चला, आसमान से उसका घर पास दिख रहा था। वो अब और तेजी से अपने घर की तरफ उड़ा, वो घर पहुचने ही वाला था तभी एक पेड़ की डाली से मानस टकरा गया, डाली से टकराकर वो धड़ाम से जमीं पर गिर पड़ा, उसके सारे पंख टूट गए। जमीं में पड़े उसकी आँख बंद होने लगी, अचानक उसकी आंख खुली और मानस ने देखा की वो बिस्तर से नीचे जमीं पर गिरा पड़ा है, अब उसे समझ में आया की ये सब सपना था।
कहानी: जीतेन्द्र कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 19 मई 2009

कविता: चिड़िया खाए पान की पुड़िया

चिड़िया खाए पान की पुड़िया
एक डाल पर बैठी चिड़िया ।
खाके पान की पुड़िया॥
तब आकर बोली एक बुढ़िया।
तुम क्या कर रही हो चिड़िया॥
बोली गुस्से में आकर चिड़िया ।
खाए बैठी हूँ पान की पुड़िया॥
प्यार से कहते मुझको गुड़िया।
दिखता नही क्या तुझको बुढ़िया॥
सुनकर चिड़िया की ऐठी बतियाँ।
गुस्से से फ़िर भर गई बुढ़िया ॥
बोली ले जाउंगी पकड़ के घर में।
तुझसे खाना बनावऊँगी चूल्हे में।।
चिड़िया बोली आसमान में उड़ जाउंगी।
पकड़ न मुझको तुम पाओगी।।
मुहँ बनके रह जाओगी।
खाली हाथ ही घर जाओगी॥
कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: लवकुश कुमार, कक्षा ५, अपना घर