गुरुवार, 1 मार्च 2018

कविता : अपवाहें

" अपवाहें "

फैली है चारो तरह अपवाहें, 
जाएं तो हम कहाँ हम जाए | 
मंदिर मस्जिद जैसे बट गए  घर,
प्यार से रहने वाले हो गए बेघर | 
शांति भी दीवारों में छिप गई,,
पीड़ितों की चिल्लाहटें गूँज रही | 
उम्मीद के परिंदे भी बैठ गए ,
इस सोच में पड़े रह गए | 
वो शांति भी जल्द आएगी, 
वो खुशिया भीचेहरे पर छाएगी  

नाम :  प्रांजुल कुमार , कक्षा :8th , अपनाघर


कवि परिचय : यह हैं प्रांजुल जो की छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं | पड़े में बहुत अच्छे हैं | यह चाहते हैं की कुछ लाइफ में बनकर दिखलाना हैं , बहुत सरे लक्ष्य रखे हैं | कवितायेँ बहुत प्रेरणादयक लिखते हैं | 

1 टिप्पणी:

Meena Sharma ने कहा…

वाह ! गंभीर सोच !