रविवार, 16 नवंबर 2025

कविता: "मेरा बचपन"

"मेरा बचपन"
 गाँव में वह बचपन मेरा ,
यादो का संसार था। 
खुशियो हर पल ही था ,
बड़े का प्यार ही प्यार था। 
बचपन के दोस्त भी मजेदार थे ,
अनोखा राज से भरे थे। 
बारिश में आँगन में खेला कप्ते थे। 
कागज के नाव बनाकर,
बाँध बनाकर छोटे तलाब बनाते थे 
गाँव में वह बचपन मेरा ,
खुशियों से भरा हुआ था। 
कवि: अमित कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

कविता: "अँधेरे में जलता दीपक"

"अँधेरे में जलता दीपक"
 अब गुमसुम हो रही गालियाँ ,
अब पराए हो रहे अपने लोग। 
अब कठिनाई की मेधा चली आई मंडराते हुए। 
अँधेरी रातो की चाँदनी भी छीन ली गई। 
अब बस उम्मीद की दीपक जल रहा मुझमे। 
सोचकर भी नहीं मिल सकता वह पल ,
जो कभी सबसे कीमती हुआ करते थी। 
यह जमी भी मुझसे रूत चुकी है ,
यह मुस्कान भी मुझसे चीन चुकी। 
सब पल भर की सोच में ,
अपने मन की इच्छा को बदल लेता हूँ। 
अब गुमसुम हो रही गालियाँ। 
अब पराए हो रहे अपने लोग। 
कवि: अमित कुमार, कक्षा: th,
अपना घर 

बुधवार, 12 नवंबर 2025

कविता: "माँ का आँचल"

"माँ का आँचल"
 कभी पीछे छिप करता था ,
कभी डरकर भाग जाया करता था ,
भीड़ देखकर माँ के आँचल में छिप जाता था ,
थोड़ी सी उलझन में और डर  की गुर्राहट से ,
शर्माते हुए इन लोगों से ,
डरकर भाग जाया, करता था। 
करीब होता था तो माँ के आँचल में छिप जाता था ,
अब बदल गया, बड़े हुआ तो बड़ा चढाव आया। 
रहो में गिरे, तो माँ ने उठाया ,
जब मैं रुठा तब माँ ने मनाया। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

कविता: "ठंडी"

"ठंडी"
 फिर से वही दिन आएंगे ,
ठंडी वाले कपड़े निकाले जाएंगे। 
कम्बल का फिर से उपयोग होगा ,
और रजाई फिर से ओढे जाएगे ,
हो सकेगा तो शायद हप्ते में रोज नहाएंगे,
फिर से वही दिन आएंगे। 
ना चाहते हुआ भी स्कूल जाएंगे ,
और शायद जाकर भी डॉट खाएंगे। 
इतना होने बाद भी रोज नहाएंगे ,
बाकी के बच्चे भी बत्तीसी दिखाएंगे 
हम भी उसी में मिल जाएंगे। 
और रोज की तरह वही दिन आएगे। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "सफलता की कुंजी"

कविता: "सफलता की कुंजी"
 ये खुशनसीब किस्मत है हमारी,
टीम टिमाते बहुत सारे तारे ,
चमकते है जिंदगी में जैसे सारे। 
कही दो पल दुख सहने तो रहने दो ,
कही दो पल की ख़ुशी तो रहने दो। 
अरे! रब ने ही भेजा था मुझे अपने कष्ट सहने को ,
कभी पेड़ो की छाव की तो कभी भटकते  राहो में ,
उस समय चेहरे पर मुश्कान थी ,
पर दिलो में जिंदगी की ही नुकसान थी। 
कवि: अजय कुमार, कक्षा: 6th,
अपना घर। 

शनिवार, 8 नवंबर 2025

कविता: "सर्दी का मौशम"

"सर्दी का मौशम"
 ये मौशम है सर्दी का,
रजाई काम करता है है वर्दी का। 
इस मौशम में कुछ भी पहनो ,
सब कुछ कम पड़  जाता है ,
चाहे जैकेट कम हो या रजाई, कंम्बल ,
फिर भी ये मौशम है ठंडी का ,
थोड़ा भी महसूस न होता गर्मी,
चाहे जितना छोड़कर रखो रजाई कंम्बल ,
क्यूंकि ये मौशम है सर्दी का। 
ये मौशम बहुत सुहाना लगता है। 
कवि: अप्तार हुसैन, कक्षा: 8th,
अपना घर। 

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

कविता: "खुशियो की लहर"

 "खुशियो  की लहर"  
जगमगा रहे है गलियाँ और चौराहें,
हर तरफ है झालर के जाले ,
टिमटिमाते रहे है सारे। 
जैसे टिमटिमाते जुगुनू सारे दिए में है खुशियाँ बाटते ,
आसमान में दिखे रंग बिरंगे तारे ,
बस प्रदूषाण है बहुत सारे। 
खुशियाँ तो मनाए आपने ,
बस बात नहीं राखी मन में आपने ,
सारे होश तो खो दिए ,
आँखी पटाखे जला दिए हजार सारे। 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर 

कविता: "अँधेरी दुनिया"

 "अँधेरी दुनिया"
 रोशनी से भरपूर इस दुनिया में,
एक अँधेरी दुनियाँ भी मौजूद है। 
जहाँ इंसान ही नहीं जानवर भी मजबूर है ,
दाने - दाने को मोहताज है लोग ,
भूखों हालत परेशान है लोग।,
गरीबी की कीरण पहुँचकर ,
आशा जगाती है उनकी, जिसकी न कोई पहचान है। 
बस अँधेरे से लड़कर जीतना ,
और गरीबी में रहकर, खुश रहने ,
ये बड़ा मुशिकल और आसान है। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर 

बुधवार, 5 नवंबर 2025

हमारा "Kho - Kho मैच"

हमारा "Kho - Kho मैच"
 चारो तरफ से सीटी की आवाज थी, 
कुछ टीमों थी और वही सक्ले तैयार थी,
जूनून सभी  के अंदर भरा हुआ था ,
बस उसको निकलने की बारी थी सबको जितना था, 
बस यही सोच में आए थे, 
हार जाएंगे, वह तो बाद की बात है ,
आ गए तो कोशिश करके जाएंगे। 
सफलता उसी को मिल रही है ,
जो बल, बुद्धि का प्रयोग कर रहा है ,
बाकी तो बुद्धिमान लोग तो थे ही, 
और उसी में हम लोगो का मैच चल रहा था। 
पर उनसे ज्यादा हम लोग ने कर दिया ,
हम ने भी कर दी इतनी मेहनत ,
की हो गया उनकी मेहनत फर्जी। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "माँ की ममता"


"माँ की ममता"
आज भी याद आती है मुझे,
वो मेरी माँ का ममता। 
जब भी मैं डरता था ,
तो वो मुझे साहस दिलाती थी ,
माँ आज तेरी बहुत याद आती है। 
 दूर रह के भी पास रहती हो ,
बार - बार मेरे सपनो में तू ही आती है। 
वैसे तो रोज तेरी याद सताती है ,
तेरी ही हर पल याद आती है ,
माँ तेरी कमी का ही अहसास होता है। 
दिल ये मेरा अभी  बच्चा है तेरी याद में बार बार रोता ,
माँ तेरी बहुत याद आती है। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

रविवार, 2 नवंबर 2025

कवि: "आज का दिन"

"आज का दिन"   
आज का दिन बीता नहीं कुछ खास, 
शाम के 8 बजे हो रहा है मुझे अहसास। 
न जाने क्यों लाग रहा मुझे  बुखार,
सर दर्द हो रहा है जुखाम भी है,
सिर्फ बिस्तर पर जाना बाकी है,
दिमाग भी खराब हो गया है न जाने कहा सो गया है। 
सिगनल  बंद हो गया है आना,
फिर भी बढ़ाना है देश की शान। 
 आज का दिन बीता नहीं कुछ खास,
शाम के 8 बजे हो रहा है मुझे अहसास। 
कवि: रवि कुमार, कक्षा: 4th,
अपना घर।