गुरुवार, 6 नवंबर 2025

कविता: "अँधेरी दुनिया"

 "अँधेरी दुनिया"
 रोशनी से भरपूर इस दुनिया में,
एक अँधेरी दुनियाँ भी मौजूद है। 
जहाँ इंसान ही नहीं जानवर भी मजबूर है ,
दाने - दाने को मोहताज है लोग ,
भूखों हालत परेशान है लोग।,
गरीबी की कीरण पहुँचकर ,
आशा जगाती है उनकी, जिसकी न कोई पहचान है। 
बस अँधेरे से लड़कर जीतना ,
और गरीबी में रहकर, खुश रहने ,
ये बड़ा मुशिकल और आसान है। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर 

बुधवार, 5 नवंबर 2025

हमारा "Kho - Kho मैच"

हमारा "Kho - Kho मैच"
 चारो तरफ से सीटी की आवाज थी, 
कुछ टीमों थी और वही सक्ले तैयार थी,
जूनून सभी  के अंदर भरा हुआ था ,
बस उसको निकलने की बारी थी सबको जितना था, 
बस यही सोच में आए थे, 
हार जाएंगे, वह तो बाद की बात है ,
आ गए तो कोशिश करके जाएंगे। 
सफलता उसी को मिल रही है ,
जो बल, बुद्धि का प्रयोग कर रहा है ,
बाकी तो बुद्धिमान लोग तो थे ही, 
और उसी में हम लोगो का मैच चल रहा था। 
पर उनसे ज्यादा हम लोग ने कर दिया ,
हम ने भी कर दी इतनी मेहनत ,
की हो गया उनकी मेहनत फर्जी। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "माँ की ममता"


"माँ की ममता"
आज भी याद आती है मुझे,
वो मेरी माँ का ममता। 
जब भी मैं डरता था ,
तो वो मुझे साहस दिलाती थी ,
माँ आज तेरी बहुत याद आती है। 
 दूर रह के भी पास रहती हो ,
बार - बार मेरे सपनो में तू ही आती है। 
वैसे तो रोज तेरी याद सताती है ,
तेरी ही हर पल याद आती है ,
माँ तेरी कमी का ही अहसास होता है। 
दिल ये मेरा अभी  बच्चा है तेरी याद में बार बार रोता ,
माँ तेरी बहुत याद आती है। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

रविवार, 2 नवंबर 2025

कवि: "आज का दिन"

"आज का दिन"   
आज का दिन बीता नहीं कुछ खास, 
शाम के 8 बजे हो रहा है मुझे अहसास। 
न जाने क्यों लाग रहा मुझे  बुखार,
सर दर्द हो रहा है जुखाम भी है,
सिर्फ बिस्तर पर जाना बाकी है,
दिमाग भी खराब हो गया है न जाने कहा सो गया है। 
सिगनल  बंद हो गया है आना,
फिर भी बढ़ाना है देश की शान। 
 आज का दिन बीता नहीं कुछ खास,
शाम के 8 बजे हो रहा है मुझे अहसास। 
कवि: रवि कुमार, कक्षा: 4th,
अपना घर। 



शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

कविता: "Sunday"

"Sunday" 
सुबह सूरज आसमान से निकला,
मेरा आँख किसी  गुड मॉर्निंग कहने पर खुला। 
फेका चददर बेड पर छोड़ छोड़ भागा ,
मंजन किया नास्ता नहीं मैंने खाना खाया। 
बाल कटवाया दोपहर मे लंच के पहले ,
खाना खाने भागा मेस के के अंदर ,
पेट भर गया मेरा बैगन का भर्ता खाकर। 
कविता है ये मेरा पूरा तो नहीं हो होगा कभी। 
कोशिश तो यही रहेगी मेरे ,
हो सपना सब का पूरा। 
कवि: रमेश कुमार, कक्षा: 5th,
अपना घर। 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

कविता: "बर्थडे"

"बर्थडे"
 आज का दिन है बहुत खास,
होगी बर्थडे केक का ही बरसात। 
साल में एक बार आता है ,
सारा का सारा खुशियां  ले जाती है। 
सारा दिन मुस्कुराते हुआ ही गुजरता ,
सॉस लेने का मौका भी नहीं मिलता की बर्थडे।
 की बधाईंया मिलना सुरु हो जाता है ,
आज का दिन है बहुत खास। 
कवि: नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
अपना घर। 

 

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

कविता: "ठंडी"

"ठंडी" 
आ गया देखो सर्दी का मौशम,
सुबह सुबह मौशम लगता है औसम। 
चारो ओर कोहरा ढक लिया सबके ,
नहाने का मन नहीं करता, 
सुबह की वो अच्छी सी नींद खराब नहीं करना चाहता हूँ। 
खिड़की से जब बहार देखो अंधेरा ही अंधेरा ,
 न जाने इस बार कैसी ठंडी होगी ,
 ये मौशम पल पल भर में बदलता है। 
कवि: अजय कुमार II, कक्षा: 6th,
अपना घर। 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

कविता: "वो आखरी घर"

"वो आखरी घर" 
गाँव का वो आखरी घर 
जहाँ खामोशी, हमेशा बरकरार है 
किस खौफनाक मंज़र मे है 
जहाँ बस अजीब सी नजरे हट गई 
खुशियों की लड़ी गायब  हो गई 
बसेरा बन गया काली परछायो का 
अब घर बन गया इन बुराइंयो का 
कितने वर्षो से यहाँ खुशियाँ नहीं ठहरी 
इसकी गलियों में कब से लोगो की यादे नहीं लौटी 
सुने आँगन में कलियाँ नन्ही खिली 
लिखा मौन उस घर के लिए, मगर 
गाँव के आखरी घर में दुबारा खिशियाँ नहीं लौटी 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर 

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

कविता: "दिवाली"

"दिवाली"
इस खुशियाँ की त्यौहार में,
हम अनजान सा बने घूम रहे है। 
सभी खुश है, मुस्कुरा रहे है ,
 और हम यहाँ गप्पे - सप्पे लड़ा रहे है, 
नीचे पटाके फूट रहे है, 
 तो कुछ चकरी से खेल रहे है, 
और हम उपर बैठे है,
झिलमिलाते आसमा को देख रहे है ,
हर तरफ से पटाके की आवाज नीचे बच्चो की शौर, 
पर किया करे झिलमिलाहट ,
को देख देख कर रहे है बोर। 
 इस खुशियाँ की त्यौहार में ,
आसमान को देखकर ही मजे ले रहे है।
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर।  

कविता: "याद कर लेता हूँ"

 "याद कर लेता हूँ"
 वैसे वो मेरी आदत नहीं फिर, 
भी याद कर लेता हूँ। 
आजकल मैं बातो को भूलने लगा हूँ, 
फिर भी याद करने की कोशिश कर लेता हूँ। 
वो सभी बाते जो निराले थे,
वो भी बाते जो महीनो पुरानी थी। 
वो सारे किस्से जो मिलकर सुनाए थे,
वो सभी चीज जो हम मिलकर सीखे थे।  
जिसने पूरा का पूरा वक्त दिया,
वो सारे राज उसने खोल दिया। 
भरोसा कर के साथ वो रह गई,
वक्त आने से पहले ही निशानी दे गई। 
वैसे तो मेरी आदत नहीं फिर,
भी याद कर लेता हूँ। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

कविता: "ठंडी का ये मौशम है आया"

 "ठंडी का ये मौशम है आया"
 जागो मेरे साथियो अब समय है ठंडी का,
उठाओ अपनी अपनी  कम्बल और रजाई ,
अब तो रात भी होने लगी है बड़ी ,
ऐसा लगता है अब धीमे हो गए है घड़ी। 
अब तो शाम भी जल्दी हो रहे है ,
मोती जैसे ओस भी गिर रहे है। 
मैदानों में और खेत खलियान में ,
हो रहा है अब देर से सुबह रात अब जल्दी ,
जागो मेरे साथियो अब समय है ठंडी का ,
ये मौशम है आया ठंडी का। 
गरम गरम होगा अब खाना ,
सुनेंगे रातो को मजे से गाना। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर।