शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

कविता : "वॉलीबॉल टूर्नामेंट्स"

"वॉलीबॉल टूर्नामेंट्स" 
आज था Altair  और allies  का final,
दोनों टीम थी आगे की ओर ,
 लगा रहे थे सभी अपनी ओर जोर ,
कौन होगा वॉलीबॉल का हक़दार। 
पहली पारी तो सुरु ही हुआ था टीम अटलाइर ने गवा बैठा पॉइंट, 
allies धीरे धीरे आगे बाद कर ऊपर आया ,
Altair को कई पॉइंट्स से पीछे छोड़ आया। 
पहली पारी तो  था allies वालो ने ,
दूसरी की कोशिश थी Altair  वालो की पर ,
चूक गए कुछ कमी की वजह से  न हाथ आया वि भी ,
और इसी के साथ ले गया final को अपनी ओर। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

कविता: "कभी अकेले रहना सीखो"

 "कभी अकेले रहना सीखो"
कभी अकेले रहना सीखो।  
आपको भी पता चलेगा अकेला पन क्या होता है ?
जो उदास हो या नाराज़ हो किसी से,
उनसे उनकी परेशानी क्या पूछ सकते हो,
वो बताने भी झिझक कर बात करेगा तुमसे। 
हो सके तो उसे अकेला रहने दो उस पल ,
दो पल ही सही पररहने कुछ पल के लिए उनको ,
कभी अकेला रहना सीखो। 
मन की बता को जानो कभी ,
उनकी सकल को जानो,
बीन देखे सवाल मत। 
 अकेला रहना सीखो । 
कवि: संतोष कुमार, कक्षा: 10th, 
अपना घर। 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

कविता: "हमारे संग के बच्चे"

"हमारे संग के बच्चे"
 हमने भी काम किये है ईट भठ्ठो पर,
ईटो की दीवार खड़े किये है,
अपने इन नन्हे हाथे से, अकार देखर बनाई है,
जलते आग में से ईटो को निकाला है,
इन हाथो की लकीरे भी मिटने लगी है,
अब ये जंजीरे भी टूटने लगी है। 
खड़ा कर दिया है बड़े - बड़े इमारते,
जिसका सामना करना मुमकिन था,
याद है आज भी मुझे जब जलते आग से ईटे को निकलता था,
हाथ में पड़ गए थे छाले, हाथ में पड़ गए थे छाले,  
पर हौसले अब भी थे निराले।  
धूप में जलते रहे कदम,  
सपनों ने फिर भी थामा दम।  
हर ठोकर ने कुछ सिखाया,  
हर आँसू ने रास्ता दिखाया।  
अब मंज़िल दूर नहीं लगती,  
क्योंकि मेहनत कभी खाली नहीं जाती।
 सारा का सारा बचपन तो पथाई से गुजरा है,
 जलते सूरज, तपती धुप से गुजरा है।  
उनको नहीं पता किया होता है जाट - पात का लेन देन,
उन्हें तो सिर्फ पढ़ाई चाहिए, एक नई जिंदगी के लिए। 
वे बड़ी - बड़ी इमारते जब दिखती है उन्हें, 
दिल की धरकने को हिला देने वाली काम करती है,
न जाने कियु उसे देख बेचैनी सी लगती है। 
खाने को खाना नहीं पीने को साफ़ पानी नहीं, 
जीने को कोई और जिंदगी नहीं है। 
झूझ रहे है कई लोग इस परेशानी से होक बर्बाद ,
जिंदगी उनकी भी चल रही है,जब तक है वो अवाद। 
 हमने भी काम किये है ईट भठ्ठो पर ,
ईटो की दीवार खड़े किये है।
तमाम ख्वाब अपने भी देखे होंगे पर कुछ हमारे भी है, 
अपनी इस ख्वाब को लेकर,
आपके साथ जीने की चाह भी  रखते है। 
 हमने भी काम किये है ईट भठ्ठो पर,
खड़ा कर दिया है बड़े - बड़े इमारते। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर।  

कविता: "गाँव का वो आखरी घर"

 "गाँव का वो आखरी घर"
जहाँ दुनियाँ मना रही है दिवाली, 
उस गाँव की आखरी घर से पूछो जिसके, पास नहीं है पीने को पानी। 
खुशी भी सही से मना नहीं पा सकते वो ,
जो हो सकता है वो सब कुछ करते है अपने बच्चे के लिए,  
मिठाई से लेकर पटाके तक भी लेकर देते है उनके लिए। 
खुद परेशान रहकर भी अपने बच्चे को खुश,
रखने की छमता रखते है अपने अंदर ,
अपनी दुखी को अलग कर के उनके साथ खुशी से रहते है, 
गाँव का वो आखरी घर। 
की दुखी में भी खुशी छिपी हुई है,
कुछ नहीं तो थोड़ा ही सा ही पर पटाके लाते  है ,
दिये भी लाते है , पूजा भी करते है पर ,
उनका रोज का खाना वही होता है। 
उसमे भी वे खुशी से रहते है, खा - पीके सपने भी देख लेते है ,
मेहनत वो भी करते है हर त्यौहार को अच्छे से मनाने के लिए पर ,
उनकी भी मज़बूरी है काम भी जरुरी है । 
जहाँ दुनियाँ मना रही है दिवाली, 
वे झेल रहे अपनी परेशानी। 
जहाँ दुनियाँ मना रही है दिवाली। 
कवि: नीरू कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर 


सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

कविता : "दीपावली "

"दीपावली "
 आ गई है दिवाली।
बच्चो की खुशी और  पटाको की आवाज आएगी।   
घरो को सफाई और तरह - तरह के लइटो से सजाएँगे। 
बच्चे धूम धाम से दीवाली मनाएँगे। 
दिए को जलाएँगे खुशियाँ सभी को बाटेंगे  आएँगे। 
की जब पटाके फूटेंगे गाँव की गलियों में, देवरो पर पॉप - पॉप मारेंगे। 
हैप्पी दिवाली सभी के लिए लिख देंगे दीवारों पर। 
वे सोर जब होंगी गाँव की गलिओं में। 
वे पटाके की जब आवाज सुनाई देंगी लोगो की। 
ताल में ताल मिलाने लग जाएँगे साथ में। 
खुशियाँ बाटेंगे साथ में। 
कवि = रमेश कुमार 
कक्षा = 5 
अपना घर 

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

कविता: "पी. टी. यम. का दिन आया"

 "पी. टी. यम. का दिन आया"
हुआ है हम सभी का आज पी. टी. यम.,
देखने को मिले है नए रैंक होल्डर्स ,
जो होता आ रहा है हर वर्ष।  
सभी के चेहरे पर खुशी ही खुशी थी ,
कुछ की चेहरे पर छाए हुई थी दुखी ,
फिर भी वो दिखा रहे थे अपने चेहरे पर खुशी, 
इस पीटीएम ने ते सब ख़राब कर के रख दिया है। 
सारा का सारा मज़ा पी .टी. एम. ने ले  लिया है। 
दुखी के मरे घर से बाहर निकला ना जाए ,
खुशियों का त्यौहार दीपावली दिन पर दिन पास बढ़ता जाए ,
हुआ है हम सभी का आज पी. टी. यम.। 
सब की मेहनत रंग लाया है ,
काला ही सभी पर कर के दिखलाया है ,
हुआ है हम सभी का आज पी. टी. यम.। 
कवि: रौशन कुमार, कक्षा: 3rd,
अपना घर। 



शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

कविता: "2025 की दीपावली"

 "2025 की दीपावली"
अपना घर के बच्चे की तरफ "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए।
हो सके तो आप सभी ग्रीन दीपावली मनाए ,
आप सभी को "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए। 
अब फूटेंगे पटाके रातो को दिन को छाए चुप्पी ,
बच्चे जलाएंगे छूरछुरीया और होंगे हैप्पी - हैप्पी। 
अब घरो में बनेगी मिठाइयाँ खट्टे और मीठे ,
खाएँगे बच्चे भर पेट होके मस्त - मगन ,
अपना घर के बच्चे की तरफ "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए।
इस बार होंगे नए पटाके नए तरंगे ,
जोश के साथ जलाए इस नए युग की पटाके, 
इस बार की दीपावली होगी "2025" की शान की तरह,
आप सभी की दीपावली की हार्दिक सुभकामनाए। 
सब पटाके फोड़ेंगे जैसे लगे कोई तीर,
खाश कर रात के खाने में बने खीर ही खीर। 
मिल कर अभी दीपावली मनाए ,
अपना घर के बच्चे की तरफ "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए।
खुश होंगे सब के चेहरे ,
मिठाइयाँ एक दूसरे को देकर बनाए रिस्ते गहरे ,
आप सभी को "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए। 
अपना घर के बच्चे की तरफ "दीपावली" की हार्दिक सुभकामनाए।
 अपना घर के बच्चे, 
अपना घर। 

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

कविता: "पापा ज़रा बूढ़े हो चले है"

 "पापा ज़रा बूढ़े हो चले है"
अब कंधे झुक गए है, 
उम्र निकल भी रही है,
रोशनी आँखों की धुंधला रही है,
थोड़ा धीरे चलते है, 
और अब भूलने भी लगे है, 
मेरे पापा ज़रा बूढ़े हो रहे है।  
आज भी बचपन हमारा,
आँखों में उनकी झूलता है, 
बड़े हो रहे है विश्वास छोड़ बच्चा समझा है। 
हमारी आज भी चिंता करते है,
अपनी फिक्र छोड़ हमारा ख्याल रखते है, 
मेरे पापा ज़रा बूढ़े हो रहे है। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

कविता: "फिलिस्तीन भी संघर्ष कर रहा है"

"फिलिस्तीन भी संघर्ष कर रहा है"
  आज़ादी का क्या मतलब है,
जहँ आज भी गुलामी बकरार है।
हुआ है जंग सुरु इजराइल और फिलिस्तीन के बिच,
बढ़ती जा रही है जलती आग की तरह।  
आज़ादी की रह पर,
लोग निकल पड़े है, लोगो की चाह पर,
है वो भी एक देश प्यारा,  
जिसे दिया देश का दर्जा है,
इजराइल रुक नहीं रहे हैं हमला करने से,
हर रोज बस मिसाइल गुरा रहा है, 
अरे! उनको मौका मत दो,
रक्त से उनका भी इतिहास लिखा जाएगा, 
हमेशा के लिए वो राजा ही कहलाएगा।  
दुनिया को रक्त से सजा रहा है, 
लोग बिन कुछ किये मृत्यु की बड़ रहे है,
दिन पर दिन लोग उन पर हावी हो रहे हैं। 
अरे! उन्हें भी जीने का हक़ दो,
ये लोगो दुनिया को बहकावा मत दो। 
मुश्किल कर देगा तेरा भी जीना,
ऊपर से निचे से निकले गए पसीना ही पसीना,
तेरा भी हो जाएगा मुश्किल जीना। 
अरे! उनमे उनका किया गलती है ,
थोड़ा बहुत तो सबके बीच में चलती है,
पर इसका ये मतलब नहीं है की तुम पूरा का पूरा पासा पलट दो। 
जिन्दा रहना तो सब के सर पर चहड़कर मत नाचो। 
कवि: नीरू कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर।  
 

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

कविता : "बस एक मुस्कान दे बहिन"

  "बस एक मुस्कान दे बहिन"
सब कुछ था ठीक, सब कुछ था प्यारा,  
हर दिन था जैसे कोई त्योहार हमारा।
 फिर एक दिन आई वो खामोशी की आंधी, 
ना जाने क्यों हो गई बातों में बंदी।
तेरी चुप्पी अब दिल को चुभती है, 
तेरे बिना हर खुशी अधूरी लगती है। 
तेरे बिना ये घर भी सूना लगता है, 
तेरी हँसी ही तो थी जो सबको जगाता है।
तेरा जन्मदिन है आने वाला,
 मैं दूँगा तुझे सबसे बड़ा तोहफ़ा निराला। 
ना कोई चीज़, ना कोई सामान, 
बस एक बार दे दे अपनी मुस्कान।
जो भी गलती हुई, मुझे माफ़ कर दे, 
तेरे बिना ये दिल अब तन्हा सा रह गया है।
मैं तुझसे फिर से बात करना चाहता हूँ, 
तेरे बिना अब जीना नहीं आता है।
कवि: नीरज कुमार II, कक्षा: 5th, 
अपना घर।  

सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

कविता: "आइ है दीपावली"

 "आइ है दीपावली" 
आ गई है द्वियो का त्यौहार दिवाली,
चारो ओर छाई है खुशहाली, 
द्वियो से सजाएंगे "अपना घर" का  द्वार, 
खुसी से मनाएंगे ये त्यौहार अपना घर के परिवार। 
हम लोग कभी नहीं छुटाते है पटाके, 
क्योकि प्रदुषण से लो हो जाते है परेशान, 
हम सब हमेशा रखते है ये सब चीजों का ख्याल, 
इस लिए हम सब मानते है ग्रीन दिवाली हर साल।  
ये है द्वियो का त्यौहार,
हर साल आता है लोगो के लिए उपहार,  
हर जगह जलाते है द्विय, 
क्योकि दीपावली है द्वियो त्यौहार।  
आ गई है दीपावली है द्वियो का त्यौहार दीपावली,
चारो ओर छाए है खुशहाली , 
द्वियो से सजाएगने "अपना घर" एक द्वार ,
खुसी से मनाएंगे ये त्यौहार अपना घर के परिवार।  
कवि: नवलेश कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर।