शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

कविता: "कहानी जिक्र का"

 "कहानी जिक्र का"
 मैं हारा तो नहीं मगर ,
अँधेरे की छाया से, 
ताब्यात हल्की सी बेहतर से बत्तर है। 
हँस पाता हूँ आज भी मैं ,
यह जानकर सुन तौबा मेरे, 
कि फिर उग आया बड़े बड़े इरादे से मैं।  
जैसे किसी बीते जन्मो में जरूर कभी ,
न हारने की कसमे  हो खाई। 

आज भी बराबर जोश और जज्बा है। 
एक नया कहानी बोने का जिसे सुन - जान - बूझकर , 
दर चिंता और रोग आएगा। 
मेरे प्रिय शत्रु को। 

अंत तो नहीं मगर, 
कहानी दोहराने जरूरत पर लौटा। 
सुन हुकूमत साहिल को भी होगा ऊंची लहरे से। 
एक कहानी जिक्र का ,
सितारे के बीच छोड़ जाना होगा। 
 मैं हारा तो नहीं मगर ,
अँधेरे की छाया से, 
ताब्यात हल्की सी बेहतर से बत्तर है। 
कवि: पिन्टू कुमार, कक्षा: 10th,
अपना घर 

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

कविता: "कुछ करना है"

"कुछ करना है"
 सिर पर भरी बोझ आ गया है ,
ठान लिया हूँ अब कुछ करने का। 
चला जाऊ कही और नया बसेरा में ,
मन नहीं लगता कुछ करने का। 
वापस चला जाऊ उस स्वतंत्र आकाश में ,
जहाँ कोई रोक - टोक न हो। 
मुक्त हो जहाँ इन मोटी बेड़िया से ,
जहाँ कोई रोक - टोक ही न हो। 
ठान लिया हूँ मन में एक बात जो है, बहुत खास। 
बीत गया वो दो पल मेरे लिए बन के बस राख। 
सिर पर भरी बोझ आ गया है,  
ठान लिया हूँ अब कुछ करने का। 
 कवि: मंगल कुमार, कक्षा:9th,
अपना घर। 
 

कविता: "नई सुबह"

 "नई सुबह"
कब नई सुबह आएगी ,
आज़ादी की किरणे लाएगी। 
जहाँ खुलकर सूरज चमकेगा। 
न सर किसी का झुक सकेगा ,
इंकलाब का नारा न रुक सकेगा। 
खुलकर सावन जहाँ अपनी ,
फुलवारी से देश महकाएगी। 
तब ये देश गर्व से स्वतंत्र कहलाएगा। 
जहाँ उठा शीश हिमालय विरो की गाथा गाएगा , 
से निकलकर सूर्य , एक नया सवेरा लाएगा ,
 तब देश आज़ादी पूर्व कहलाएगा। 
कब नई सुबह आएगी ,
आज़ादी की किरणे लाएगी।
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th, 
अपना घर। 

बुधवार, 20 अगस्त 2025

कविता: "समुन्द्र की लहरे "

 "समुन्द्र की लहरे "
कुछ ख़ास नहीं है ये लहरे।
पर उड़ते समुन्द्र में बड़ी मनभावन है ये। 
उड़ते हुए पानी को चंचल बनाती है। 
जीवन में मुशिकलों से लड़ना सिखाती है ,
कही दूर उगते हुए झीतिज में सूरज,
लालिया दर्शाती है , डूबते सूरज 
को नया सवेरा लाने का सन्देश देती है। 
बदलते वक्त में बदल नहीं सकती,
हवा के वेग से लड़ नहीं सकती 
कुछ ख़ास नहीं है ये लहरे, 
अपने में ही सुलझी हुए पहली है लहरे। 
उड़ते हुए समुन्द्र की एक बड़ी पहचान है लहरे। 
कवि:  साहिल कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 


मंगलवार, 19 अगस्त 2025

कविता: " तुम कौन हो ? "

 " तुम कौन  हो ? " 
 तुम कौन  हो ?
दुखो से दबकर जीने वाले। 
या, फिर आवाजों की दम पर लड़ने वाले। 
तुम गलत हो। 
उस मोड़ पर तुम चुप रहा जाते हो,
अनजान की तरह मुँह मोड़ लेते हो। 
तुम कौन हो। 
यह सब देखकर,
 या, अपनी बातो को रखने वाले ,
तुम आगे चलो अपने हक के लिए। 
यह समाज तो निचा दिखाएगा ही। 
उनकी रहो पर मत चलो।  
 तुम कौन हो ?
जिन्दा होते हुए भी मुर्दा बन जाते,
या फिर दुखो से दबकर जीने वाले। 
गलत का साथ देने वाले। 
या गलत होने से रोकने वाले ,
 तुम कौन हो ?
हर बुराइयाँ को सहने वाले। 
या, उसे अनजान बने सुनते वाले। 
तुम कौन हो  ?
कवि: अमित कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

सोमवार, 18 अगस्त 2025

कविता: "ए आसमा कब मुस्कुराएगा"

"ए आसमा कब मुस्कुराएगा"
 ए आसमा कब मुस्कुराएगा ,
अंधूरे जंग में नया सवेरा लाएगा ,
 ए आसमा कब मुस्कुराएगा। 
कबतक उम्र जावा रहेगी ,
अपने पैर कभी  कभी डग डगमाएगी ,
इन कंगाली की रहे पर। 
 कुर्ते और पयजामों संग ,
शोषद की डगरहो पर चलेगा। 
समाज से कब  दीवारों को गिराएगा ,
 ए आसमा कब मुस्कुराएगा। 
 जब सबको बराबर जीने का हक़ होगा ,
सवालों के अपने जवाबो पर गर्व होगा ,
इस राह का इन्तजार पर गर्व होगा ,
उम्र तब जावा रहना क्योकि कल ए आसमां मुस्कुराएगा। 
खुशियों की नई बौछार लाएगा ,
हर किसी की खुशुयो की बहार लाएगा ,
मुस्कुराहटो की नई उमंग लाएगा ,
उम्र तब तक जावा रहना ,
क्योकि आसमां कल मुस्कुराएगा। 
 ए आसमा कब मुस्कुराएगा .... ।। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

रविवार, 17 अगस्त 2025

Poem: "Apna Ghar "

 "Apna Ghar "
Apna Ghar was started in 2006,
present day the number of students is 36.
aim is for migrant children educational development,
so, they can take journey from hurts to compartment.
students live together, eat together, 
play together and go to School together,
in any situation they get gather,
they face the situation together.
but they live together.
they have self-rule and regulation,
we run the hostel just like a nation. 
student from Bricklin and constructed sites,
where for the basic life they have to fight.
 Apna Ghar was started in 2006,
present day the number of students is 36.
Poet: Pankaj Kumar, class: 10th 
Apna Ghar.

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

कविता: " वीर योद्धा "

 " वीर योद्धा  "
 वीरो कि क्या तारीफ करूँ ,
जो हँसाना हँसाना फाँसी पर झूल गए। 
डरे नहीं वो मौत से ,
शेर बनकर दहाड़ गए। 
बिन गोली हथियार से फिरंगियो से वो जूझ गए। 
एक नहीं सौ - सौ को अकेले ही पछाड़ गए। 
स्वपन रहा आजादी का बचपन से ,
उस स्वपन को साकार गए। 
डरे नहीं फिरंगियो से ,
मौत के सामने सीना तान खड़े , 
इंकलाब का नारा बोल  गए।  
क्या तारीफ करूँ वीरो की ,
जो हँसाना - हँसाना फाँसी पर झूल गए। 
सभी को मेरे तरफ से " इंडिपेंडेंस डे " की हार्दिक सुभकामनाये।  
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर 

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

कविता: "बरसता का महीना"

 "बरसता का महीना" 
इस मौसम  का क्या कहना है,
गर्मी को कैसे सहना है। 
सूर्य का यह प्रकश,
कर दे रही है पसीना का बरसात।
चारो और फैली सूर्य का प्रकाश,
 इसी प्रकाश से ही रहा है गर्मी का अहसास।
इस कड़क धुप से ,
मुश्किल कर दिया बाहर आना - जाना 
इस मौसम  का क्या कहना है ,
गर्मी को कैसे सहना है। 
कवि: नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
अपना घर। 

कविता: "सूरजदेव अहिया "

 "सूरजदेव अहिया " 
 फिर से अहिया ,
देर नय करिहा कहेले कि। 
सोबल नय जा हको करि रतिया में। 
करवटिया ले हकियो  तो ,
अखिया मूंदे में डरो हकियो। 
कहो कि एक बेरी सोबे पर ,
उपबन कि नय उठबन जल्दी। 
जेकर खातिर हमराले ,
तोहार उगल मुखड़ा के। 
देखले बड़ी देर हो जितो। 
हे! सूरजदेव सुनली। 
तुरंते अहिया देर नय करिहा। 
उगिहा रोज भोरे - भोरे ।।
कवि: पिंटू कुमार, कक्षा: 10th, 
अपना घर। 

कविता: "बारिश"

 "बारिश" 
 बरसात का मौसम है आया। 
चारो तरफ बरस रही वर्षा रानी।
कर दिया है अब जगह पानी ही पानी। 
बरस रहा है बरसा रानी। 
बचे बोलते हम पानी में नहाएगे
भैया सभी को डॉट लगाते ,
बुँदे है जैसे मोती , बचे देख इतराते। 
बरसात का मौसम है आया। 
चारो तरफ बरस रही वर्षा रानी।
कवि: नितीश कुमार, कक्षा: 6th,
अपना घर।