सोमवार, 17 नवंबर 2025

कविता: "ठंडी का मौशम"

"ठंडी का मौशम"
 ठंडी धीरे धीरे बड़ रही है ,
दिन छोटे तथा राते लंबी है ,
 सभी के जुबान में एक ही चीज ,
है की बहुत सर्दी हो  रही है। 
लड़के - बच्चे , बूढे दादा ,
सब है ओढ़े है साल ,
पता नहीं कब जाएगी सर्दी। 
शायद लग जाए कई साल ,
सर्दी में कपकपी छूटी है ,
क्यूंकि ये मुस्कान सर्दी की जूठी है। 
कवि नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
अपना घर। 

रविवार, 16 नवंबर 2025

कविता: "कविता"

"कविता"
कविता ऐसा हो जिसमे मजा आए ,
रस हो खिलखिलाहट हो ,
जो पढ़ने में भा जाए, 
पहाड़ हो, रंग - बिरंग तितलियाँ हो ,
अहसास हो उस पल का। 
तेज हवाए और आंधी भी हो ,
फसले भी खिल उड़े और हरियाली भी ,
जो दिल और दिमाग में समा जाए ,
कविता ऐसा हो। 
कवि: रमेश कुमार, कक्षा: 5th,
अपना घर। 


कविता: "14 नवंबर"

"14  नवंबर"
 आज चाचा नेहरू के फोटो पर फूल चढ़ाते है ,
वो नही है तो क़्या हुआ ,
हम फिर भी उनकी जयंती मानते है। 
 वापस खुशियाँ चाचा नेहरू पर आती है ,
यही खुशियाँ चाचा की याद दिलाती है।  
वह बच्चो के सिखाते थे, की कोशिश करते रहो ,
यह आकाश तुम्हारा है, मिलेगा तुमको सब कुछ तुमको ,
बस संघर्ष तुम्हारा हो। 
 आज चाचा नेहरू के फोटो पर फूल चढ़ाते है। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "बहारों का साथ छोड़ना"

"बहारों का साथ छोड़ना"
 ए सदाएँ पूछती है इस बहारों से, 
क्या जिया तुमने दुनिया में ?
जिंदगी भी रूठी और साथ भी छूटा ,
न जाने कैसा रिस्ता टुटा ,
हर बदलते मौशम में ,
कशमकश भरी जिंदगी में ,
मिलती नहीं नजरे - नजरे से ,
मुस्कुराकर छिप जाती है इन भीड़ भरी सड़के पे। 

बहारो ने रास्ता छोड़ा, सदाओं ने साथ भी,
आँखों ने रोना छोड़ा, चेहरे ने मुस्कुराना भी ,
बहारो ने साथ छोड़ा और तुमने हाथ भी ,
जिंदगी भी रूठी और साथ भी छूटा।

अब पूछती है सदाएँ इन बहारों से ,
क्या जिया तुमने दुनिया में ,
जिंदगी भी रूठी और साथ भी चुटी ,
न जाने कैसे ये रिस्ता टुटा। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "मेरा बचपन"

"मेरा बचपन"
 गाँव में वह बचपन मेरा ,
यादो का संसार था। 
खुशियो हर पल ही था ,
बड़े का प्यार ही प्यार था। 
बचपन के दोस्त भी मजेदार थे ,
अनोखा राज से भरे थे। 
बारिश में आँगन में खेला कप्ते थे। 
कागज के नाव बनाकर,
बाँध बनाकर छोटे तलाब बनाते थे 
गाँव में वह बचपन मेरा ,
खुशियों से भरा हुआ था। 
कवि: अमित कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

कविता: "अँधेरे में जलता दीपक"

"अँधेरे में जलता दीपक"
 अब गुमसुम हो रही गालियाँ ,
अब पराए हो रहे अपने लोग। 
अब कठिनाई की मेधा चली आई मंडराते हुए। 
अँधेरी रातो की चाँदनी भी छीन ली गई। 
अब बस उम्मीद की दीपक जल रहा मुझमे। 
सोचकर भी नहीं मिल सकता वह पल ,
जो कभी सबसे कीमती हुआ करते थी। 
यह जमी भी मुझसे रूत चुकी है ,
यह मुस्कान भी मुझसे चीन चुकी। 
सब पल भर की सोच में ,
अपने मन की इच्छा को बदल लेता हूँ। 
अब गुमसुम हो रही गालियाँ। 
अब पराए हो रहे अपने लोग। 
कवि: अमित कुमार, कक्षा: th,
अपना घर 

बुधवार, 12 नवंबर 2025

कविता: "माँ का आँचल"

"माँ का आँचल"
 कभी पीछे छिप करता था ,
कभी डरकर भाग जाया करता था ,
भीड़ देखकर माँ के आँचल में छिप जाता था ,
थोड़ी सी उलझन में और डर  की गुर्राहट से ,
शर्माते हुए इन लोगों से ,
डरकर भाग जाया, करता था। 
करीब होता था तो माँ के आँचल में छिप जाता था ,
अब बदल गया, बड़े हुआ तो बड़ा चढाव आया। 
रहो में गिरे, तो माँ ने उठाया ,
जब मैं रुठा तब माँ ने मनाया। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

कविता: "ठंडी"

"ठंडी"
 फिर से वही दिन आएंगे ,
ठंडी वाले कपड़े निकाले जाएंगे। 
कम्बल का फिर से उपयोग होगा ,
और रजाई फिर से ओढे जाएगे ,
हो सकेगा तो शायद हप्ते में रोज नहाएंगे,
फिर से वही दिन आएंगे। 
ना चाहते हुआ भी स्कूल जाएंगे ,
और शायद जाकर भी डॉट खाएंगे। 
इतना होने बाद भी रोज नहाएंगे ,
बाकी के बच्चे भी बत्तीसी दिखाएंगे 
हम भी उसी में मिल जाएंगे। 
और रोज की तरह वही दिन आएगे। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "सफलता की कुंजी"

कविता: "सफलता की कुंजी"
 ये खुशनसीब किस्मत है हमारी,
टीम टिमाते बहुत सारे तारे ,
चमकते है जिंदगी में जैसे सारे। 
कही दो पल दुख सहने तो रहने दो ,
कही दो पल की ख़ुशी तो रहने दो। 
अरे! रब ने ही भेजा था मुझे अपने कष्ट सहने को ,
कभी पेड़ो की छाव की तो कभी भटकते  राहो में ,
उस समय चेहरे पर मुश्कान थी ,
पर दिलो में जिंदगी की ही नुकसान थी। 
कवि: अजय कुमार, कक्षा: 6th,
अपना घर। 

शनिवार, 8 नवंबर 2025

कविता: "सर्दी का मौशम"

"सर्दी का मौशम"
 ये मौशम है सर्दी का,
रजाई काम करता है है वर्दी का। 
इस मौशम में कुछ भी पहनो ,
सब कुछ कम पड़  जाता है ,
चाहे जैकेट कम हो या रजाई, कंम्बल ,
फिर भी ये मौशम है ठंडी का ,
थोड़ा भी महसूस न होता गर्मी,
चाहे जितना छोड़कर रखो रजाई कंम्बल ,
क्यूंकि ये मौशम है सर्दी का। 
ये मौशम बहुत सुहाना लगता है। 
कवि: अप्तार हुसैन, कक्षा: 8th,
अपना घर। 

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

कविता: "खुशियो की लहर"

 "खुशियो  की लहर"  
जगमगा रहे है गलियाँ और चौराहें,
हर तरफ है झालर के जाले ,
टिमटिमाते रहे है सारे। 
जैसे टिमटिमाते जुगुनू सारे दिए में है खुशियाँ बाटते ,
आसमान में दिखे रंग बिरंगे तारे ,
बस प्रदूषाण है बहुत सारे। 
खुशियाँ तो मनाए आपने ,
बस बात नहीं राखी मन में आपने ,
सारे होश तो खो दिए ,
आँखी पटाखे जला दिए हजार सारे। 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर