मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

मरना ही हैं सरल
मुसाफिर चला हैं लेके अपने खाली हाथो को ,
तुम भी तो समझो मुसाफिर की इंसानियत को....
सफ़र हैं बहुत ही दूर,
पर उसकी ताकत हो चुकी हैं चूर....
मुसाफिर चला हैं अपना पेट भरने को,
पेट के वास्ते सभी को छोड़ा एस ज़माने को .....
किसी को छाया हैं अमीरी का नशा,
कंगाल वही हैं जो न देखे गरीबो की दशा....
मुसाफिर चाहे मारे चाहे भूखे ही तडपे ,
हर कोई उसको ही हदाकाए.......
पेट भरना बड़ा ही हैं मुश्किल,
इससे अच्चा मरना ही हैं सरल....
लेख़क आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कविता :वो हामिद कहाँ है

वो हामिद कहाँ है

मेला वही है ,
ईद वही है ....
चूल्हा वही है ,
दादी वही है ....
आज भी अगुंलियाँ ,
जलती दादी की हैं ....
आखों में उसके ,
समंदर भरा है ....
मगर आज अपना ,
वो हामिद कहाँ है ....
इस भीड़ में ,
वो खोया कहाँ है ....


लेख़क : महेश
अपना घर

कविता सही हमें नहीं पता

सही हमें नहीं पता
असमान हैं नीला नीला ,
कपडे पहने पीले पीले....
पानी बरसे होले होले,
असमान हैं क्या .....
हमें नहीं हैं पता ,
पानी क्यों बरता हैं....
बिजली क्यों गरजती हैं,
असमान हैं नीला क्यों....
यह हमें नहीं पता हैं,
यह हमारी मजबूरी हैं....
दूसरे हमें सताते हैं,
जो कोई भी पूछता हैं....
तो गलत बताते हैं ,
सही उत्तर हम नहीं जानते हैं....
असमान हैं नीला नीला,
कपडे पहने पीले पीले ....
लेख़क मुकेश कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

कविता छोटे पौधे

छोटे पौधे
छोटे पौधे कितने अच्छे ,
फूल लागे हैं कितने ....
गेंदा गुलाब हैं फूल अनेक,
बगीचे में लगते हैं सब इक....
पौधे हमें लगते अच्छे,
कितने प्यारे कितने अच्छे ....
कलियाँ खिलती खिलता फूल,
छोटे पौधे कितने अच्छे.....
पौधे हमें लगते अच्छे ,
कलियाँ खिलती खिलता फूल ....
कितने अच्छे लगते फूल....
लेख़क धर्मेन्द्र कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कविता :अरे यह जीभ भी अजीब

अरे यह जीभ भी अजीब

अरे भाई यह जीभ भी अजीब
नाक के भरोसे है
खुशबू बाहर से आती है
पानी से यह भर जाती है
अरे भई यह जीभ भी अजीब ।
जो वह आखों से देखती है
खाने को वह मांगती है
जब खाना मिल जाता है
तो pet भर जाता है
बड़ा मजा आता है

लेख़क :अशोक कुमार
कक्षा :
अपना घर

शनिवार, 25 सितंबर 2010

कविता :सुनो-सुनो माताओं और बहनों

सुनो-सुनो माताओं और बहनों

सुनो-सुनो माताओं और बहनों ।
चोरो और लुटरों से बचकर रहना ॥
अपनी रक्षा खुद ही करना ।
पुलिश को तो है अब कुछ नहीं कहना ॥
उन्हें है अब बस ड्यूटी करना ।
चोर जब चोरी कर के भागता है ॥
तो पुलिश कुछ नहीं कर पाती है ।
जब चोर पकड़ जाता हैं ॥
आधा-आधा पैसा बट जाता है ।
सुनो-सुनो माताओं और बहनों ॥

लेख़क :सागर कुमार
कक्षा :
अपना घर

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

कविता देखो आसमान में उड़ रही पतंगे

देखो आसमान में उड़ रही पतंगे
देखो भाई कितनी रंग बिरंगी पतंगे ,
उड़ रही आसमान में ये सारी पतंगे....
आसमान में सभी पतंगों को उड़ाते...
जब पतंगे कट जाती हैं,
लडके सब दौड़ -दौड़ कर लूटने जाते....
नहीं इनकी होती कीमत जादा,
एक दो रुपये में मिल जाती अच्छी -अच्छी पतंगे...
लोग इनको खूब उड़ाते,
और बच्चे करते मौज मस्ती....

लेख़क चन्दन कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

सोमवार, 20 सितंबर 2010

कविता बचकर रहना

बचकर रहना
सुनो -सुनो व भाई बहना,
आई फ्लू से बचकर रहना....
आई फ्लू हैं एक ऐसी बीमारी,
सबको कर देती हैं हैरानी....
सुनो -सुनो व भाई बहना,
आई फ्लू से बचकर रहना....
साफ सफाई से रहना हर दम,
आई फ्लू को दूर भगाना....
सुनो -सुनो व भाई बहना,
आई फ्लू से बचकर रहना....
लेख़क सागर कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

कविता महात्मा गांधी

महात्मा गांधी

गांधी जी ने की थी जो लड़ाई,
मारी किसी को गोली दी गाली....
प्रेम और अहिंसा के बल से,
दिला दी उन्हों ने आजादी....
चले गए अंग्रेज छोड़ के ये देश ,
बापू हो गये दुनिया के प्यारे....
बापू ने बोली ग़ली -ग़ली पर एक ही बोली,
हिन्दुस्थान हमारा सबसे न्यारा....



लेख़क लवकुश कक्षा ७ अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कविता :लगाओ दस पेड़ हर साल

लगाओ दस पेड़ हर साल

होगें जंगल,झरने, नदी और तलाब
और होगें ये मानव
उजड़े पेड़ होंगें और खेत खलिहान
जब ये प्रक्रति होगी
करो कोई येसा काम
जिससे प्रक्रति का हो नुकसान
येसी करो प्रतिज्ञा हर साल
लगाओ दस पेड़ हर साल


लेख़क :अशोक कुमार
कक्षा :
अपना घर

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

कविता ऐसी कौन सी बात

ऐसी कौन सी बात
एक बात हैं बेनकाब,
जिसका नहीं किसी के पास जवाब.....
जवाब भी होता तो क्या करते,
डर के मारे इधर -उधर छिपते रहते....
यह बात जरा ध्यान से सुनो भाया,
हर बात के पीछे छिपी हैं काले धन की माया....
काला धन हो या मेहनत का पसीना,
किसी के आगे नहीं झुकता अब ये जमाना.....
सभी को अपने कामों की पड़ी हैं जल्दी,
घर में नहीं हैं तेल, नून और हल्दी....
उनको तेल, नून, हल्दी से क्या लेना -देना,
जिस तरह निरमा से अलग हो जाता फेना.....
बहुत हुआ अब बेनकाब बात बताओ,
बात बता दी पूरी सुना नहीं क्या तुम हो बहरे.....
कुआँ, नदी होती जैसी गहरी नहरे,
अब अपने आस पास यह बात बताओ....
ढोल डुग्गी पीट कर आवाज लगाओ,
भ्रष्ट नेताओं से अपना देश बचाओं .....
लेख़क: आशीष , कक्षा अपना घर कानपुर