गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कविता :अरे यह जीभ भी अजीब

अरे यह जीभ भी अजीब

अरे भाई यह जीभ भी अजीब
नाक के भरोसे है
खुशबू बाहर से आती है
पानी से यह भर जाती है
अरे भई यह जीभ भी अजीब ।
जो वह आखों से देखती है
खाने को वह मांगती है
जब खाना मिल जाता है
तो pet भर जाता है
बड़ा मजा आता है

लेख़क :अशोक कुमार
कक्षा :
अपना घर

5 टिप्‍पणियां:

रानीविशाल ने कहा…

बात तो बिलकुल सही है :)
नन्ही ब्लॉगर
अनुष्का

माधव( Madhav) ने कहा…

sundar

Akshita (Pakhi) ने कहा…

मजेदार है यह जीभ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अरे वाह!
जीभ की कविता तो बहुत सुन्दर है!
--
इसकी चर्चा तो बाल चर्चा मंच पर भी है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/10/20.html

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर गीत अशोक जी---।