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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

कविता : भीख मांगते नर व् नारी

 भीख मांगते नर व् नारी 

एक भिखारी हाथ पसारे ,
ज़िंदा है तो सिर्फ भीख सहारे.....
सबकी गाली सबकी बातें वह है सुनता,
अपनी दास्ताँ किसी से बयां नहीं करता....
जो कुछ मिलता ले लेता ,
पेट के बल झुक कर चलता ....
राम दुहाई हाय राम दुहाई ,
मार गयी यह हमको मंहगाई.....
डायन बनीं है सरकार हमारी ,
अब भीख मांगते नर व् नारी  .......

लेखक : आशीष कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर  

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

कविता : सूरज

सूरज 
 
ऊपर उठ आया,
ले रोशनी की भरमार....
सारी रात इंतजार किया,
अब आ छाया सब के सिर पर.....
जिसने दिया इस धरती को जीवन,
दिखला सबसे अपनापन.....
नाम तो आपको पता ही होगा,
उसके बिन जीवन जीना असंभव होगा.....
उससे ही है इस धरती पर हलचल,
नाम है जिसका सूर्य चंचल.....   

लेखक : आशीष कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर  

मंगलवार, 14 जून 2011

कविता : किसान का बेटा हुआ महान

 किसान का बेटा हुआ महान 

बच्चे ने जन्म लिया ,
घर में आयीं खुशियाँ ...
खेतों में हरियाली छायीं,
घर में अनाज की बोरियां आयीं ...
माता ने पढ़ा था ग्रहविज्ञान,
घर पर बनाती है पकवान ....
पिता था उसका अज्ञान ,
इसलिए वह बना किसान....
माता-पिता ने बच्चे को पाला,
हर सुख उसको दे खुद को दुख में डाला ....
माता-पिता ने बच्चे खातिर मेहनत की रातो-दिन ,
आगें जाकर 'किसान का बेटा हुआ महान'.....

लेखक : आशीष कुमार 
कक्षा : ९
अपना घर 

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

शीर्षक : भारतवर्ष

 भारतवर्ष 
एक राग एक ही धुन में रहते , 
गणतंत्र दिवस सभी मनाते ....
एक ही गीत को रटकर गाते  ,
भारत-माता की जय-जय करते  ....
जय-जय करना और नारे लगाना ,
जब मन में आये तब से सब करना ....
क्योंकि आजादी मिले हुये कई बरस ,
फिर भी धरती रही हरियाली को तरस  ....
सबके सब आपस में लड़ते ,
फिर भी हिन्दुस्तान का नाम रटते  ....
कहते भारत वर्ष हमारा है  ,
यह हम सब को जान से प्यारा है  ....

लेख़क :आशीष कुमार 
कक्षा :८ 
अपना घर

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

कविता ऐसी कौन सी बात

ऐसी कौन सी बात
एक बात हैं बेनकाब,
जिसका नहीं किसी के पास जवाब.....
जवाब भी होता तो क्या करते,
डर के मारे इधर -उधर छिपते रहते....
यह बात जरा ध्यान से सुनो भाया,
हर बात के पीछे छिपी हैं काले धन की माया....
काला धन हो या मेहनत का पसीना,
किसी के आगे नहीं झुकता अब ये जमाना.....
सभी को अपने कामों की पड़ी हैं जल्दी,
घर में नहीं हैं तेल, नून और हल्दी....
उनको तेल, नून, हल्दी से क्या लेना -देना,
जिस तरह निरमा से अलग हो जाता फेना.....
बहुत हुआ अब बेनकाब बात बताओ,
बात बता दी पूरी सुना नहीं क्या तुम हो बहरे.....
कुआँ, नदी होती जैसी गहरी नहरे,
अब अपने आस पास यह बात बताओ....
ढोल डुग्गी पीट कर आवाज लगाओ,
भ्रष्ट नेताओं से अपना देश बचाओं .....
लेख़क: आशीष , कक्षा अपना घर कानपुर

रविवार, 5 सितंबर 2010

कविता रक्षाबंधन

रक्षाबंधन
राखी आयी राखी आयी,
भाई ने बहनों के हाथो से राखी बंधवायी....
राखी नहीं ये हैं रक्षाबंधन,
कभी न टूटे भाई बहन के रिश्तों का बंधन....
रक्षाबंधन का पर्व सभी मानते ,
हिन्दू हो या मुस्लिम सभी इसके गाते गुण....
श्रावण माह की तिथि में इसे मानते,
भाई अपनी बहनों को रक्षा का आशीष देते....
हर पर्व सभी के लिए खुशियाँ लाते,
वह सभी के मन को हर्षाते.....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कविता हर इक गाँव में

हर एक गाँव में
हरे पेड़ की झाँव में,
देश के हर इक गाँव में....
आते लोग जाते लोग,
अपनी गलती पर पछताते लोग....
एक गाँव के छोर से,
मोर के सुन्दर पंखों से....
हंसते गाते चलते मुस्कराते,
सब चलते अपने -अपने रस्ते....
रास्ता कठिन हैं यही बताते,
अपनी मंजिल पाने से डरते.....
अपनी मंजिल वही पाते,
जो कभी विपत्ति से न डरते....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कविता धर्म जाति का भेद भुलाए

धर्म जाति का भेद भुलाए
धर्म -धर्म क्यों करते हैं ?
धर्म जाति पर मरते हैं,
धर्म के खातिर मरने वाले ....
इस वतन के हैं जो रखवाले,
धर्म किसी का हिन्दू.....
धर्म किसी का मुस्लिम,
धर्म किसी का सिक्ख....
धर्म किसी का इसाई,
धर्म सभी का अलग -अलग हैं.....
सभी की रंघो में खून तो एक हैं,
हाथ पैर सब कुछ तुम्हारे हैं......
हाथ पैर सब कुछ मेरे भी हैं,
सबके कोई न कोई अपने हैं....
हर एक मानव के भी सपने हैं,
इस सपने को हम कैसे पाये....
आओं हम सब आपस में मिल जाये ,
धर्म जाति का भेद भुलाए.....
आपस में एक का मेल बढाए.....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

रविवार, 1 अगस्त 2010

कविता कलम प्यारी

कलम प्यारी
कितनी प्यारी कलम हमारी |
इससे निकली विधा सारी||
लिखती कविता और कहानी|
कितनी प्यारी कलम हमारी||
इससे निकली विधा सारी|
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर