शनिवार, 13 मार्च 2010

कविता :हम सब बीमार पड़ते

हम सब बीमार पड़ते

जब- जब नाख़ून हुए बड़े,
गंदगी उसमें भरना शुरू हुयी ।
देखने में अच्छे न लगते,
सफाई ठीक से कर न पाते।
गन्दगी उसमें भरी रहती,
खाने के साथ में।
मुँह के अन्दर जाती,
अनेक बिमारी के लक्षण होते।
झट से हम बिमार पड़ते,
डाँक्टर के पास जब जाते।
डाँक्टर झट से दवा है देता,
नाख़ून काटने को साथ में कहता।
नाखुनो को हमेशा रखो साफ़,
बीमारी के समूह में।
कभी न हो तुम साथ,
जब जब नाख़ून हुए बडे,
तब तब बीमारी हुई हमारे साथ।

लेखक : अशोक कुमार
कक्षा :
अपना घर

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

कविता कोयल


कोयल

कोयल हूँ मैं कोयल हूँ ,
काली रंग की मैं कोयल हूँ....
कौवा को बेकूप बनती हूँ,
और कौवा बेकूप बन जाता हैं ....
मैं अपना अंडा कौवा के,
घोसले में रख देती हूँ....
और कौवा मेरा अंडा सेता हैं,
और मेरे बच्चे को पाल लेता हैं....
जब मेरा बच्चा थोड़ा सा बड़ा हो जाता हैं,
तब कौवा उसे अपनी चीजे कुछ न देता....
अपने घोसले से भगा देता हैं,
और फिर कौवा पस्ताता हैं....
और कोयल गीत गाती हैं,
फिर कोयल उड़ जाती हैं....
लेखक हंसराज सिंह कक्षा ६ अपना घर कानपुर

गुरुवार, 11 मार्च 2010

कविता :काला कौआ गुस्से में भड़का

काला कौआ गुस्से में भड़का

एक था कौआ
एक था बउवा
कौआ रोता ,बउवा सोता
जब बउवा रोता ,तब कौआ सोता
एक दिन एक उल्लू आया
संग में अपने एक साड़ी का पल्लू लाया
उल्लू बोला ये लो साड़ी का पल्लू
बउवा के सिर पर डाल मेरे लल्लू
गुस्से में आकर कौआ बोला अबे उल्लू
निकल ले उठा के अपना साड़ी का पल्लू


लेखक :आशीष सिंह
कक्षा :
अपना घर

कविता: रंग -बिरंगी चिड़ियाँ

रंग -बिरंगी चिड़ियाँ

रंग -बिरंगी चिड़ियाँ आयें ।
पूरब से पश्चिम को जायें ॥
जो -जो चिड़ियाँ न उड़ पायें ।
धरती पर वो नाचे -गायें ॥
रंग -बिरंगी चिड़ियाँ आयें ।
उड़ -उड़ कर वो नदी में जायें ॥
वहां पर अपनी प्यास बुझायें ।
रंग -बिरंगी चिड़ियाँ आयें ॥

लेखक :ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर

बुधवार, 10 मार्च 2010

कविता :जनसंख्या

जनसंख्या

जनसंख्या में क्यों हो रही वृद्धि ।
भारत है एक छोटा सा देश ॥
जनसंख्या है भारत में कितनी ।
नहीं किसी को पता है भाई ॥
जनसँख्या पार कर गई अरबों की गिनती ।
एक घर में जो दो बच्चे ॥
तभी तो एक वह कुशल परिवार ।
नहीं कभी दुखी रहेगें माता- पिता और बच्चे ॥
बच्चे लिखकर होगें सच्चे ।
जनसंख्या में क्यों हो रही है वृद्धि ॥

लेखक :सोनू कुमार
कक्षा :
अपना घर

मंगलवार, 9 मार्च 2010

कविता : पृथ्वी

पृथ्वी

पानी की बढ़ती मात्रा
ले डूबेगी पृथ्वी को
पिघल रही बर्फ पर्वतों से
और बढ रहा है पानी
कट रहें पेड़ कम बचे हैं जंगल
बढ रहे मकान बढ रहीं हैं फैक्ट्रियां
काम करो ये फैक्ट्री
कम होगा ये धुंआ
बंद करो ये पेड़ काटना
बर्फ पिघलना होगी कम
बचेगी नष्ट होने से पृथ्वी
और बचेगा आदमी
मिलेगा जीवन फिर से
और बचेगी ये पृथ्वी
लेखक :सोनू कुमार
कक्षा :
अपना घर

सोमवार, 8 मार्च 2010

कविता - होली का दिन आया



होली का दिन आया

होली का दिन आया है
सब के मन में खुशियाँ लाया है ॥
होली में लाल गुलाबी सभी रंग हैं मिल जाते
तो होली का मजा कुछ और ही हो जाता है ॥
होली का त्यौहार सभी को आपस में मिलाता है
सभी रंग में भंग हो जाते हैं
आपस में सभी लोग मिल जाते हैं
मस्त होकर गाना गाते हैं
होली का दिन आया है
खुशियाँ सभी के मन में लाया है

लेखक :हंसराज कुमार
कक्षा :
अपना घर

शनिवार, 6 मार्च 2010

कविता -दंगा

दंगा
एक बार शेर और बकरी में हो गया दंगा ।
बकरी बोली हिम्मत है तो ले मुझसे पंगा ॥
शेर ने बकरी की बात को सुनकर ।
बोला येसे शब्दों को चुनकर ॥
शेर और बकरी की बातों को सुनकर ।
तभी अचानक आया नन्हा खरगोश ॥
और बोलने लगा शेर की तरफ ।
बकरी बोली चुपकर कछुए से हार गया ॥
बातों ही बातों में शेर बकरी से हरा ।
तब शेर ने गुस्से में बकरी को मारा ॥
बहाना बना कर बकरी गई भाग ।
तभी नन्हा खरगोश गया जाग ॥
डर के मारे खरगोश वहाँ से भागा ।
शेर बेचारा है कितना अभागा ॥

लेखक :धर्मेन्द्र
कक्षा :
अपना घर

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

कविता -पुलिस न हुई किसी भाई

पुलिस हुई किसी भाई

एक चोर चार बन्दर ,
पाँचो गये जेल के अन्दर ......
चोर का नम्बर चार सौ बीस ,
एक सिपाही बोला चल मसाला पीस ......
एक बन्दर का नंबर एक सौ तीन ,
एक सिपाही जाकर बोला चल बजा बीन ......
दूजे बन्दर का नंबर सात सौ दस ,
एक सिपाही बोला ये रोज चलाएगा बस ......
तीजे बन्दर का नम्बर एक हजार ,
सिपाही बोला ये सब्जी लेने जायेगा रोज बजार ......
चौथे बन्दर का नंबर आठ हजार ,
एक सिपाही से बोला आओ बैठें यार ......
बन्दर बोला तू चोर मैं सिपाही ,
अदालत में देदो मेरी गवाही ......
हम सब हैं जंगल के भाई ,
तुमने हमको क्यों पकड़ा भाई ......
तब तक एक दरोगा आया ,
उसने चारो को अपने पास बुलाया ......
उसने पूछा कौन है चोर कौन है सिपाही ,
चारो बन्दर बोले हम है जंगल के राही ......
दरोगा बोला तुम हो सब साहूकार ,
जाओ हमने तुमको छोड़ा , हो जाओ फरार ......
दरोगा ने सिपाही से कहकर चोर को बुलवाया ,
उसे देख वह आश्चर्य में पाया......
क्योंकि वह चोर था दरोगा का पापा ,
दरोगा ने उसे देख अपने गले लगाया ......
गाडी मे बैठाकर उसको घर पहुंचाया,
पुलिस न हुई किसी की भाई ......
क्योंकि बाप को अपने जेल पहुँचाई ,
चार थे चोर चार थे बन्दर ......

लेखक :आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर

कविता - बाघ बचाओ

बाघ बचाओ
वन्य जीवों का पता लगाओ ,
सब मिलकर राष्ट्रीय "पशु " बाघ बचाओ
जंगलो को कटने से बचायें ,
जंगल जा -जाकर बाघों का पता लगायें
अब पूरे भारत में चौदह सौ ग्यारह बाघ बचे हैं ,
उनमें से आधे तो अभी बच्चे हैं
उन्हें बचाने के खातिर जंगल काटें ,
जगह -जगह पेड़ लगाने के लिए लोगों को बाटें
राष्ट्रीय पशु "बाघ" हम सब को बचना है ,
जंगलों को हरा-भरा और बनाना है

लेखक :आशीष सिंह
कक्षा :
अपना घर

मंगलवार, 2 मार्च 2010

कविता -रात को मुझको सपना आया

रात को मुझको सपना आया

हमने है एक कविता बनाया ,
जिसका तुका ना मिला पाया
चटनी के बिन समोसा खाया ,
सब्जी के बिन रोटी खाया
रोड पर जाकर गाड़ी चलाया ,
आसमान में जहाज उड़ाया
कच्चे - कच्चे ईंटों को बनाया ,
भट्ठों में घोंड़ो को चलाया
रात को अच्छा खाना खाया ,
बेड पर जाकर मैं फिर सोया
आखें खोला तो अपने को बिस्तर पर पाया,
पता चला कि मुझको रात को सपना आया

लेखक : आदित्य पाण्डेय, कक्षा : , अपना घर