कविता :- हंसराज कुमार बाल कविताएँ बाल कहानियाँ बाल गीत किस्से कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता :- हंसराज कुमार बाल कविताएँ बाल कहानियाँ बाल गीत किस्से कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

शीर्षक :- पतंग

शीर्षक :- पतंग 
आकाश और गगन में। 
उड़े पतंग संग में।। 
मन चाहा घूमा करती। 
पक्षियों से बातें करती।। 
ठुमक-ठुमक कर नाचा करती। 
सभी के मन को भाती।। 
पतंग ये ऐसी उड़-उड़ जाती। 
मन चाहा ऊपर जाती।। 
मन चाहे तो नीचे आती। 
मन चाहा घूमा करती।। 
आकाश और गगन में। 
कवि:- हंसराज कुमार 
कक्षा:- 9 
अपना घर 

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

शीर्षक :- रात

शीर्षक :- रात 
अँधेरी काली रात....
रात की ये बात,
सुबह के पीछे रात....
शाम के आगे रात,
नीदों की ये बात....
सपनों की ये बात, 
बातों की ये रात....
जानों की ये रात,
सोंचने की ये बात....
अँधेरी क्यों है? ये रात,
नीदों की ये रात....
सपनो की ये रात,
सूरज की ये बात....
अँधेरी है ये रात,
कवि :हंसराज कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर  

बुधवार, 11 जुलाई 2012

शीर्षक :- तारों के पास

शीर्षक :- तारों के पास
पड़ती गर्मी होती बरसात....
फिर मन मेरा होता उदास,
गर्मी में मरते है....
फिर कीचड में फसंते है,
ये गर्मी न होती....
न होती बरसात,
फिर मन मेरा न होता उदास....
सूर्य न होता,
बदल न होते....
न होता ये आकाश,
काश हम होते तारों के पास....
फिर मन मेरा होता क्यों उदास,
कवि : हंसराज कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर 

शुक्रवार, 29 जून 2012

शीर्षक :- मछली

शीर्षक :- मछली 
मछली का जीवन पानी के तरंगो से....
हलचल होती उसके अंगो से,
लहरों के हलचल  से.... 
मछली ऊपर नीचे होती लहरों के तरंगो से, 
मछली का जीवन उसकी उमंगो से....
मछली होती कोमल अपने अंगो से,
मछली जल की रानी है....
जीवन उसका पानी है,

कवि : हंसराज कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर 

सोमवार, 25 जून 2012

शीर्षक :- बचपन

शीर्षक :- बचपन 
बच्चे होते है, मन के सच्चे....
सबको लगते हैं, अच्छे,
लगते हैं, तब तक अच्छे....
रहते हैं, जब तक बच्चे,
जब हो जाते हैं, वो बड़े....
तब बचपन खो जाता है,
घर गृहस्ती में लोग लग जाते हैं....
उसी जीवन में व्यस्त हो जाते है,
फिर कभी उससे निकल नहीं पाते हैं....
इसी में जीवन ख़त्म हो जाता है,
ये बच्चे होते हैं मन के सच्चे....


कवि : हंसराज कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर 

गुरुवार, 14 जून 2012

शीषक :- पाने के लिए

शीषक :- पाने के लिए 
इस जीवन के सफ़र में....
शुरू से अंत तक,
कुछ भी हम करते हैं....
तो कुछ पाने और,
कुछ खोने के लिए....
शायद हम पढाई करते हैं,
तो दोस्तों का प्यार खेल कूद....
और वो हसीं मजाक लड़ना झगड़ना,
सब कुछ खो देते है....
शायद हमारे माँ बाप, 
एक वक्त की रोटी के लिए....
वो मेंहनती काम और दूसरों की,
बातों को सुनने को तैयार रहते है....
अपना सुख चैन सब कुछ खो देते हैं,
शायद हमारी जिंदगी का मतलब ही....
कुछ पाने के लिए कुछ खोना है,
कवि : हंसराज कुमार
कक्षा : 9
अपना घर