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शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कविता :-रंग दे बसंती

रंग दे बसंती 
रंग दे बसंती चोला....
हर जगह शहीदों का टोला,
नव वर्ष की इस बेला....
उन शहीद वीरों का मेला,
जिन शहीदों ने अपनी जान पर खेला....
शहीदों के मेले जायेंगे,
अब हर वर्ष हम मनाएंगे....
जोश भरा रग-रग,
दुश्मन को मार गिराएंगे....
अब लगेगा हर वर्ष शहीदों का मेला,
मेरा रंग दे बसंती चोला....
नाम :चन्दन कुमार 
कक्षा :-6 
अपना घर 
                                                                                                                                         

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

कविता : पथ

 पथ 
 मेरा एक ही पथ है ,
आगे बढ़ने का .....
जो मुश्किलें आयें ,
उनको आगे से हटाने का....
मेरी एक ही मंजिल है ,
अपने लक्ष्य को पा लेने का ....
मेरा एक ही पथ है ,
आगे बढ़ने का ......

लेखक : चन्दन कुमार 
कक्षा : 6
अपना घर 
 
 

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

कविता; घरों में खुशहाली...


घरों में खुशहाली...

हवा चल रही है पुरवाई ।
खेतों में फैली है हरियाली ॥
कोयल की गीत है मधुर मतवाली।
सड़कों पर बज रहे है शहनाई ॥
घरों में बहुत है खुशहाली।
हवा चल रही है पुरवाई ॥


लेख़क: चन्दन कुमार, कक्षा ५, अपना घर

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

कविता: बचपन के रंग ....

बचपन के रंग ....

बचपन में माँ से लड़ना झगड़ना ।
उसके ही हाथों से रोटी फिर खाना ॥
उसके साथ ही चलना और घूमना ।
गोदी में चढ़कर उसके मचलना ॥
पापा से झट से पैसे ले लेना ।
पैसे से टाफी और इमली खाना ॥
चिढ़ना-चिढ़ाना रोना-रुलाना ।
लुकना-छिपना हँसना-हँसाना ॥
माँ की गोदी था प्यारा सा पलना ।
पकड़े जो कोई तो धोती में छिपना ॥
ऐसा था प्यारा सा बचपन का रंग ।
गुजरा था जो मेरे माँ बाप के संग ॥

अशोक कुमार , कक्षा ८, अपना घर

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

कविता मोर हमारा

मोर हमारा
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा ,
फुदुक फुदुक कर नाच दिखाता....
फुर्र फुर्र कर वह झट उड़ जाता ,
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा ....
हमारे पास न आता वो,
न हमारे संग खेला करता ....
फुर्र फुर्र कर वह झट उड़ जाता ,
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा .....
लेख़क चन्दन कुमार कक्षा ५ अपना घर कानपुर

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

कविता रेल चली

रेल चली
रेल चली रेल चली ,
छुक छुक करती रेल चली ....
डग मग करती रेल चली,
एक डिब्बे में पहिये होते चार....
लोग बैठे होते एक हजार,
उसमे से आधे होते गरीब....
ज्यादा होते हैं अमीर,
रेल चली रेल चली....
लेख़क चन्दन कुमार कक्षा ४ अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

कविता मोर आया

मोर आया
देखो रंग बिरंगा मोर आता हैं |
बच्चे देखकर करते हैं शोर||
मोर आते हैं बच्चों के शोर से|
बच्चे देखकर करते शोर||
एक बच्चे ने मोर को पकड़ा|
बच्चे करने लागे लड़ाई झगडा||
लड़ाई झगडा मत करो|
मिल जुल कर रहे हम सब बच्चे||
लेखक चन्दन कक्षा ४ अपना घर कानपुर