रविवार, 12 अक्टूबर 2025

कविता: "तबाही"

 "तबाही"
तड़ा - तड़ हुआ गोला बारुद,
झाड़ - झाड़ हुआ गोलियों की बरसात। 
जो भी आमने - सामने आया ,
मौत को वो गले लगाया। 
जैसे - तैसे जी जान लगाया जिन्दा रहने के लिए , 
सब संम्पतियो को छोड़ - छाड़ आया ,
है! बेतहारना छोड़ा और भागा 
मगर कैसे ये हो पाता संभव कोई वहाँ से बच निकलता ,
चाहे कर लेते वो भी अगर लाखो कोशिश ,
फिर भी कुछ नहीं वो कर पाते। 
तड़ा - तड़ हुआ गोला बारुद ,
झाड़ - झाड़ हुआ गोलियों की बरसात।
कवि: पिन्टू कुमार, कक्षा: 10th,
अपना घर।  

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

कविता : "गाज़ा की कहानी"

 "गाज़ा की कहानी"
 जिस तरह इसराइल ने गाज़ा ,
पर बम वारुद दागने लगे है।  
ठीक उसी तरह बाकी देश ,
उसको बचाने के बजाए वो खुद भागने लगे है। 
सभी घरो में बैठे बैठे देख ,
रहे है उसके जंग।  
बेचारा ग़ज़ा भी सोच रहा है। 
काश कोई पल भर के लिए हो जाए संग, 
खाना मिलने की परेशानी है। 
चारो तरफ आग और रक्त की निशानी है।  
पर अभी भी जाने की चाह है, 
भले ही उसके लिए नहीं कोई रहा है। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

कविता: "पढ़ - लिख रहा हूँ"

 "पढ़ - लिख रहा हूँ" 
इस समय फुल जोश में पढ़ रहा हूँ,
लिख भी रहा हूँ। 
ये भी बता दू की मैं अभी तैयारी कर राहु,
क्यूंकि परीक्षा का एलान है न ,
तभी इस तरह पागल सा पढ़ रहा हूँ।  
लिख भी रहा हूँ। 
तुमने ने कहा मैं सो जाता हूँ, 
ऐसी बात नहीं है यार, 
वो गलती से आँख बंद होता है।  
जान बूझकर वैसे भी तो आज तक सोया नहीं, 
कभी ऐसी कोशिश भी किया होगा,
मुझे अच्छे से कुछ याद नहीं। 
खेल - कूद तो, है कुछ खाश नहीं, 
इसलिए छोड़ दिया हमने उसको न जाने कब का। 
ये भी मुझे याद नहीं, 
अगर दंग से कुछ कर हूँ ,
तो सिर्फ में पढ़ हूँ लिख रहा हूँ,
इस तरह मैं। 
तैयारी कर रहा हूँ.......... ।। 
कवि: पिंटू कुमार, कक्षा: 10th,
अपना घर। 

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

कविता: "मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी "

 "मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी "
मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी।  
न जाने कहा से दुखो का पहाड़ टूट पड़ा,
जीना कर रखा है मुश्किल अब मेरा 
क्या करे कुछ समझ नहीं आए रहा है?
जहाँ मै कभी हस्ता था अब रोया न जाए,
धीरे - धीरे से दुखो का पहाड़ बढ़ता जाए।
मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी।  
आपको मेरी खुशी देखी नहीं जा रहा क्या?
अरे मुझे भी जीने का हक़ है अपनी तरह से,
अब बस करो मुझे परेशान करना 
अब मुझे भी है जीना और मरना। 
न जने कौन सा परिंदा है तू, 
अब तक क्यों जिन्दा है तू ?
मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी। 
न जाने क्यों हसी नहीं आती है अब ?
रूठा रूठा सा लगता हूँ अकेला सा लगता हूँ। 
क्या ये कोई रिस्ता है। 
मस्त मगन मेरी भी जिंदगी थी। 
कवि: नीरु कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 


सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

कविता: "मुझे अकेला ही रहने दो"

 "मुझे अकेला ही रहने दो" 
क्यों छीन रहे हो मेरी खुसी मुझसे,
क्या हमसे कोई नाराजगी है। 
अरे जीने दो जिंदगी मुझे अपनी तरह,
इसमें क्या कोई बुराई है. 
हर वक्त रुकावट दी आपने,
जो मेरे तक ही रहती है। 
है कभी पूछा आपने हमसे,
की मेरे मन में क्या रहती है।  
कभी घूम ले बाहर जाके, 
पर आपकी नहीं मर्जी है।  
घुटन हो रही है मुझे आपसे ,
या फिर आप में ही कोई बुराई है।  
रहने दो बस अब इतना,
अब आगे की जिंदगी मेरी है। 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

कविता: "कब होगा भारत मेरा ऐसा"

 "कब होगा भारत मेरा ऐसा"
 खेतों में किशान फसल लगाएगा।  
तो चारो ओर हरियाली छाएगा। 
तभी ये देश प्रदूषण से बच पाएगा। 
और हरियाली चारो ओर छाएगा। 
अब वो मौशम आएगा , 
जब भारत  देश विकास की रेस में आएगा। 
किशानो की मेहनत से चारो और हरियाली छाएगा। 
जब देश में फसल लहराएगा 
पेड़ो पर सारे चिड़िया चहचहाएगा ,
सभी लोग खुसी से गाएगा। 
भारत देश विकाश के रेस में आएगा ,
जब फसल चारो ओर लहराएगा 
फसल भी झूम - झूमकर गाएगा। 
खेतों में फसल किशान लगाएगा ,
तो खेतो में फसल लहराएगा 
किशान भी झूम - झूमकर गाएगा ,
जब फसल खेतो में लहलहाएगा। 
झूम- झूमकर गाएगे और फसल लहराएगा 
जब देश में हरियाली आएगा। 
तो सारे फसल लहराएगा, लहराएगा, लहराएगा।  
कवि: नवलेश कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

कविता: "मेरा अधूरा सपना "

"मेरा अधूरा सपना " 
सुबह हो गयी , दोपहर हो गयी, और शाम भी हो गयी।  
अब बैठे - बैठे समय कट रहा है। 
इस बिच रत भी हो गई है। 
जब अंदर गया तो नींद आ गयी,
जब सोया तो सपनो में खोया,
एक अन बेसुनि सी आवाज से नींद खुली 
सपना टूटने की वजह से मैं खूब रोया, 
दूर जाती रही वो आवाज पीछा करती रही। 
जब तक उसने मेरी नींद खराब नहीं,
कर दिया तब तक उसे चैन न रही। 
घूमता - फिरता मस्ती मैं चलता, 
गिरता - संभलता रहो में चलता,
सुबह से शाम कब हो गयी।  
कवि: मंगल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

कविता: "नींद आ रहा था"

 "नींद आ रहा था"
मन की गहरी छत में किताब लिए पढ़ रहा था। 
खोया मेरा नाजुक दिल , खली,
और रुवासा चेहरा मी साथ था। 
आगे के प्रश्न धुंधली और कठिनाई से उभर रहा था। 
मन थोड़ा परेशान था मगर दिल में , 
न हार माने का जीगर था 
पर उसी समय मेरा पूरा शरीर सिमट कर हार रहा था,
आँखे मानो ज्वाला से जल रहा हो। 
सच्च बताऊ दोस्तों। 
ये सब सिर्फ निंदा में होता है। 
कवि: निरंजन कुमार, कक्षा: 9th 
अपना घर। 

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

Poem: "Ant's kingdom"

"Ant's kingdom"
what's gang in ant's kingdom?
finding something that all the time.
whether it is day or night,
they are working so unlike, 
and are very fast too. 
don't know what purpose they special,
seeing not a bit of pause, 
  there may be a captain or leaders.
under whose guiding they're,
working with full of fear, 
is in the kingdom jewels is more. 
for safety and security of it,
combination is preparing on, 
what's gang there, do you have on idea?
it's a matter if you don't,
why they seem so crazy, 
in the kingdom of ants.
what's does they have 
and 
what we can't have?
Poet: Pintu Kumar, Class: 10th 
Apna Ghar 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

Poem: "Sun in the Sky"

 "Sun in the Sky" 
Sun is shining in the sky,
which I like mos.t 
in my whole life dream,
I was giving lost. 
my life was given for away, 
which I would not stop. 
I want to begin me new life dream,
like a dreamer's shop. 
just like sky silence in, 
silence without stars.
my life was given very for, 
imagine the new world full of happiness.
if anyone not come to you, 
you will feel loveliness.
Poet: Mangal Kumar, class 9th, 
Apna Ghar.

Poet: "Future is Our Gaming"

 "Future is Our Gaming"
 I started dreaming that,
future in now gaming.
all talented children are,
participating in it.
from the apps YouTube, insta to reddit.
children are playing with full interest,
Infront of their parents or even secret, 
all are blaming. 
But Who Care?
Future is our Gaming.
Poet: Mangal Kumar, Class: 9th,
Apna Ghar