शनिवार, 13 नवंबर 2010

कविता : अच्छा बनना

अच्छा बनना
लोगों से मै विनती ,
एक ही बात मै उनसे करता....
पढ़-लिख कर अच्छा ,
कोई न अनपढ़ रहना....
लूट पात तुम कुछ न करना,
न ही किसी की हत्या करना....
लालच एक भी न करना,
चोरी से हरदम बचना....
पढ़-लिख कर अच्छा बनना,
कोई अनपढ़ रहना....
लेख़क : अशोक कुमार
कक्षा : , अपना घर

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कविता: चलो रण भूमि पर

चलो रण भूमि पर

उठो मेरे भारत वासी,
करो न तुम अब देरी।
लेकर इस वतन की मिट्टी,
बांध लो अपनी मुट्ठी ।
अपने पथ पर चलते हुए ,
पहुचो रण भूमि पर।
आज दुश्मन है अपना ही कोई ,
जो देश को चला रहे है ।
जो लूट रहे है खसोट रहे है,
देश की मिटटी पानी को बेच रहे है।
आज करो तुम अपनी माटी की रक्षा,
चुकी खतरे में हैं आज अपनी यह भूमि।


लेख़क : अशोक कुमार
कक्षा : ८
अपना घर , कानपुर

कविता : क्यों निराश बैठा हैं

क्यों निराश बैठा हैं
क्या हम सोच सकते हैं,
उस पक्षी की आहट।
जो बैठा है उस वृक्ष की डाल पर,
उसे आहट से परवाह नहीं ।
ये मरने के लिए बैठा हैं,
या फिर किसी का इंतजार कर रहा हैं।
न जाने क्या सोच रहा हैं,
यह हमें पता नहीं।
क्यों , निराश बैठा हैं,
क्यों यूं उदास बैठा है।
लेख़क : अशोक कुमार
कक्षा : ८
अपना घर , कानपुर

कविता: प्रभात सौन्दर्य

प्रभात सौन्दर्य
सुबह का है ये मौसम सुहाना ,
अच्छा लगता हैं टहलने जाना.....
सूरज अपनी लालिमा बिखेरता,
फिर इस संसार को निहारता.....
पर्वतों के बीच से सूरज निकलता,
उसकी लालिमा को देख कर जी मचल उठता ......
और चिड़ियों का चहचहाना,
अच्छा लगता उनका यह गाना.....
ह्रदय को हरने वाली यह सुन्दरता,
देख यह सब कितना अच्छा लगता.....
सूरज की ये प्यारी किरणें,
जो पानी में लगती हैं गिरने....
सौन्दर्यता का प्रतीक यह प्रभात,
सबको अच्छी लगती यह बात....
लेख़क : धर्मेन्द्र कुमार
कक्षा : ८
अपना घर , कानपुर

कविता : मानव भी दानव हो गया

मानव भी दानव हो गया
क्या हो रहा हैं इस संसार में ,
कैसा शोर मचा हैं इस संसार में ....
अब क्या होगा इस संसार का,
मैं सब यह सोच रहा हूँ .....
मानव
भी दानव हो गया हैं ,
अब खेत भी खलिहान हो गये ....
पहले खेतों में होती थी हरियाली,
मानव के अन्दर आ जाती थी खुशहाली .....
लेकिन अब कहाँ होती हैं हरियाली,
अब मानव की बात हैं निराली .....
लेख़क : ज्ञान कुमार
कक्षा :
अपना घर , कानपुर

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

कविता: बाल दिवस

बाल दिवस
बाल दिवस हैं आने वाला,
चाचा नेहरू की याद दिलाने वाला....
चाचा नेहरू को बच्चे प्यार कराते हैं,
बाल दिवस तक याद रखते हैं....
चाचा नेहरू करते थे सबसे प्यार,
सब बच्चे करते थे उनसे अच्छा व्यहार....
बाल दिवस हैं आने वाला,
चाचा नेहरू की याद दिलाने वाला ....
लेख़क: चन्दन कुमार
कक्षा :
अपना घर , कानपुर

सोमवार, 8 नवंबर 2010

कविता :अधिकार

अधिकार

जनमत निर्माण हमारा है ,
मानव-धिकार हमारा है ......
सूचना का अधिकार हमारा है ,
जन कल्याण हमारा है ......
जनता को शिक्षा की राह दिखलाता है ,
वह जनमत निर्माण कहलाता है ......
जहां सामाजिक,राजनीतिक,धार्मिक ,
एवं आर्थिक प्रदान किया जाता है ......
वह मानव-धिकार कहलाता है ,
सूचना का अधिकार हमारा है .......
सभी नागरिकों का प्यारा है ,

लेख़क :मुकेश कुमार
कक्षा : 9
अपना घर

रविवार, 7 नवंबर 2010

कविता :करें तैयारी अच्छी

करें तैयारी अच्छी

सो रहे हैं हम ,
रही है परीक्षा निकट .....
जागें और करें तैयारी ,
लायें परीक्षा में अंक अच्छे .....
जिससे खुश हो जाएँ सब ,
सो रहे हैं हम .....
रही है परीक्षा निकट ,

लेख़क :अशोक कुमार
कक्षा :8
अपना घर

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

कविता :विद्यालय जायेंगे जरुर

विद्यालय जायेंगे जरुर

विद्यालय जायेंगे जरुर ,
डांट पड़े या मार पड़े .....
बरसात में भीगेंगे खड़े-खड़े ,
विद्यालय जायेंगे जरुर .....
मार पड़े तो मार सहेंगे ,
चाहे जितना काम मिले .....
हम सब पूरा काम करेगें ,
विद्यालय जायेंगे जरुर .....
टीचर चाहे जितना डर दिखलायें ,
चाहे जितना कठिन पेपर बनाएं .....
उसको भी हम हल करेगें ,
विद्यालय जायेगें जरुर ......
हिंद निवासी हम मजदूर प्रवासी ,
हम बच्चे हैं हिन्दुस्तानी .....
संसार का उठाएंगे सारा भार ,
लेकर रहेंगे स्वतंत्रता का अधिकार ......
विद्यालय जायेंगे जरुर ....
इसकी उसकी चुगली नहीं करेंगे ,
हम सब मिलकर रहेंगे ......
इस देश पढ़ने का है सबको अधिकार ,
विद्यालय जायेंगे जरुर ......

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :8
अपना घर

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

कहानी :सपनों में परियाँ

सपनों में परियाँ

एक समय की बात हैबैजूपुर गाँव में जान नाम का एक लड़का रहता थावह प्रतिदिन स्कूल जाया करता थाउसको परियों की कहानी सुनने में बहुत पसंद थींवह जब भी सपना देखता,उसे सपने में परियाँ जरुर दिखतींउसका एक दोस्त बन्दर था,जिसका नाम जनारदन थाउन दोनों में बड़ी दोस्ती थीएक दिन जान स्कूल से वापस आया और आते ही बिस्तर पर जाकर सो गयाजान सोते हुये यह सपना देखने लगा की वह प्रथ्वी से बाहर,अपने परिवार से दूर,अपने दोस्त जनारदन के साथ वह परियों के देश में पहुँच गया हैवह और उसका दोस्त एक उडनतश्तरी में खड़े हैंऔर उनके आस पास कई परियाँ उड़ रही हैंअब वह दोनों अपने हाथों से चाँद-तारों को छू सकते थेतभी जान को भूख लगीउसने जनारदन से पूछा की क्या तुमको भूख लगी है?हाँ मुझे भी लगी हैजनारदन ने कहातभी वहां पर एक परी उनके लिए ढेर सारी मिठाइयां,फल और खाने की चीजें कई प्रकार की लेकर आयीउन दोनों ने जैसे खाना प्रारम्भ किया ही था,कि जान की माँ ने जान को सोते हुये से जगा दियाजान जैसे ही जगा,उसने देखा कि मैं तोअपने बिस्तर पर बैठा हूंउसका दोस्त जनारदन बाहर बैठा उसके साथ खेलने का इन्तजार कर रहा हैउसकी माँ ने कहा कि जाओ हाथ-मुंह धुल लो और अपने दोस्त के साथ खेलो जाकर,वह तुम्हारा इन्तजार कर रहा हैजान अपनी माँ से कहने लगा कि माँ अगर आप थोड़ी देर और उठाती तो मैं अपने दोस्त के साथ परियों के देश में अच्छा-अच्छा खाना खा लेता,मगर आपने उठा दियामाँ ने कहा अब सपने देखना छोड़ो और जाकर अपने दोस्त के साथ खेलो जाकरठीक है माँइतना कहकर जान अपने बिस्तर से उठकर,हाथ मुंह धुलकर अपने दोस्त जनारदन के साथ खेलने चला गया

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :8
अपना घर

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

कविता :एक गाय की प्यारी बछिया

एक गाय की प्यारी बछिया

एक गाय की बछिया नीली ,
आँखे थी उसकी पीली-पीली ....
दिखने में लगती छैल-छबीली ,
भागे तो लगती रंग-रंगीली ....
ताजी हरी घास को वो खाती ,
कभी-कभी वह उस पर सो जाती ....
उसकी माँ जब उसे बुलाती ,
मां-मां करती दौड़ी आती ....
सबको लगती थी वह प्यारी ,
इसलिए नाम था उसका रामप्यारी ....

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :8
अपना घर