गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कविता: प्रभात सौन्दर्य

प्रभात सौन्दर्य
सुबह का है ये मौसम सुहाना ,
अच्छा लगता हैं टहलने जाना.....
सूरज अपनी लालिमा बिखेरता,
फिर इस संसार को निहारता.....
पर्वतों के बीच से सूरज निकलता,
उसकी लालिमा को देख कर जी मचल उठता ......
और चिड़ियों का चहचहाना,
अच्छा लगता उनका यह गाना.....
ह्रदय को हरने वाली यह सुन्दरता,
देख यह सब कितना अच्छा लगता.....
सूरज की ये प्यारी किरणें,
जो पानी में लगती हैं गिरने....
सौन्दर्यता का प्रतीक यह प्रभात,
सबको अच्छी लगती यह बात....
लेख़क : धर्मेन्द्र कुमार
कक्षा : ८
अपना घर , कानपुर

2 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर....

NEHA MATHEWS ने कहा…

वाह धर्मेन्द्र मजा आ गया, बहुत अच्छा लिखा है |