शनिवार, 20 नवंबर 2010

कविता :सावधान तुम रहना

सावधान तुम रहना

सुनों-सुनों हे भाई बहना ,
हरदम सावधान तुम रहना ....
गाँव भी बनें हैं अब तहखाना ,
सुरक्षित नहीं किसी का बाहर जाना ....
लूट-पाट के ढेर लगे हैं ,
लूटने वालों की भीड़ें लगी हैं ....
किसी की चेन लुटी है ,
तो किसी के गहनें चोरी ....
घरों का जिसने ताला तोड़ा है ,
उसने की है बड़ी हरामखोरी ....
मेरा तो बस एक ही कहना ,
भाई-बहनों सावधान तुम रहना ....
चोर लगें हैं आपके पीछे ,
ख़तरा मंडराता ऊपर नीचे ....
चोर है कोई बड़ा ही शातिर ,
वह करता रहता आपके घर की जांचे ....
तुम सब मिलकर लगाओ एक जुगत ,
जिससे चोर यहाँ से जावे भागत-भागत ....

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :८
अपना घर

2 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

सही बात... अच्छी कविता....

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत सुन्दर.बधाई!