बुधवार, 24 नवंबर 2010

कविता : स्कूल हमारा मांगे अब पैसा-पैसा

स्कूल हमारा मांगे अब पैसा-पैसा

स्कूल हमारा यह कैसा है ,
शिक्षा में अब तो पैसा ही पैसा है ....
शिक्षा में मिले सभी को मुनाफा ,
प्रिंसिपल साहब चेयर में बैठे हैं बाँध के साफा ....
एक दिन बैठे मुंह में उंगली डाले ,
दूर से देखा तो लगती आम की काली- काली डालें .....
न जाने उनके दिमाग में आया कहाँ से एक प्लान ,
बोले हम सब मिल बनाएं इस देश को महान .....
महान बनायेगें हम इसको कैसे ,
प्रिंसिपल से एक ने पूछा जैसे .....
सब अध्यापक बोले हाँ-हाँ कैसे ,
क्योंकि सेवा करने में भी लगते हैं पैसे .....
पैसों को तुम मारो गोली ,
भर दूंगा मैं तुम सब की झोली .....
येसी तो थी प्रिंसिपल की बोली ,
बोले स्कूल में बैठ लगाओ बच्चों की बोली ......
हम बच्चो को झूठा लालच देकर ,
अपने जाल में सभी को फंसाकर ......
भिजवा देगें दूर देश-विदेश ,
जिससे हम सब को मिलेगा कैस ही कैश .....

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर

4 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

अच्छी कविता.....

sandhya ने कहा…

acchi kavita aur naya kuchh likho

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

ब्यूटीफुल क्रिएशन!
आशीष कुमार को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
--
आपकी पोस्ट की चर्चा तो बाल चर्चा मंच पर भी लगाई है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/11/29.html

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत सुन्दर.बधाई!