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बुधवार, 19 सितंबर 2012

शीर्षक :- महंगाई

शीर्षक :- महंगाई 
महंगाई की ऐसी मार पड़ी। 
कि जनता सारी हो  बेहाल।। 
टूट गई अब सारी आशाएँ। 
महंगाई ने जब बिछाया जाल।। 
गरीबी नहीं है इस देश में। 
गरीबों को तो बनाती है ये सरकार।। 
महंगाई को बढ़ा-बढ़ा कर। 
कर दिया सबको बेरोजगार।। 
महंगा हो गया आटा चावल। 
महंगाई ने जब बिछाया जाल।। 
आलू टमाटर का मत पूछो भाव। 
लेकर खाली झोला वापस जाओ।। 
कवि:- धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा:- 9 
अपना घर  

शनिवार, 15 सितंबर 2012

शीर्षक :- समस्या विश्व पर्यावरण की

शीर्षक :- समस्या विश्व पर्यावरण की ...................।
वर्तमान समय के इस दुनिया में। 
विकट एक समस्या आ गई।। 
विश्व पर्यावरण है वो समस्या। 
जो संक्रामक की तरह छा गई।। 
एक तरफ दौड़ती कार और मोटर गाड़ियाँ। 
और एक तरफ कटते पेड़ जंगल और झाड़ियाँ।। 
विश्व पर्यावरण दिवस सब मन रहे। 
और फैक्ट्रियों का पानी गंगा में बहा रहे है।। 
पर्यावरण समस्या है ये विश्व समस्या। 
इसका निदान नहीं हो सकता।। 
जब तक हम स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर।
इसके प्रति सचेत न हो जाएँ।। 
कवि :- धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा :- 9 
अपना घर 

सोमवार, 3 सितंबर 2012

शीर्षक :- बचपन

शीर्षक :- बचपन 
याद आते वो बचपन के दिन।
न बीतता था समय खेले बिन।। 
वो मौजमस्ती और बीते वो पल।
याद आ जाते है आजकल।। 
वो कबड्डी और गुल्ली डंडा। 
दिन भर खेलना अपना था बस यही फंडा।। 
दोस्तों संग वो लुका छुपाई। 
कभी याद आ जाते है भाई।। 
खेल-खेल में समय गया कब बीत। 
समझ आई अब दुनिया की रीति।। 
दोस्तों में न करते थे भेदभाव। 
एक दुसरे के लिए था दिलों में घाव।। 
कवि:- धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा:- 9 
अपना घर  

रविवार, 26 अगस्त 2012

शीर्षक :- मेरा मन

शीर्षक :- मेरा मन कहाँ 
जाने कहाँ को चलता है ये मन....
जाने क्यों मचलता है ये मन,
जिधर भी चलता है ये मन....
उधर ही चल पड़ता है ये तन,
मन सोचंता है कि....
बिन पढ़े सफलता मिल जाये,
और स्कूल में सबसे ज्यादा....
मेरे ही नंबर आये,
इसी प्रकार के हजारों विचार....
हमारे मन में है आते,
इन्ही हजारों विचारों में....
हमारे सब विचार खो जाते,
मन के इन्ही विचारों से....
मिलती है मन को संतुष्टी,
धीरे-धीरे मेहनत करके....
होती इन विचारों की पुष्टि,
कवि:- धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा:- 9 
अपना घर