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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

चीटीं

चीटीं 

चीटीं होती कितनी हल्की ,
बोझा लेके चलती हिलती-डुलती .....
जाड़े के लिए भोजन करती एकत्र,
 इसलिए वह घूमा करती सवत्र....
देख रही है वह एक दाना ,
जो उसको है अपने बच्चों को खिलाना ...
जाड़े में है वह ठंडी सहती ,
अपनी शरीर की सुरक्षा करती.....
चीटीं होती कितनी हल्की ,
बोझा लेके चलती हिलती-डुलती....

लेखक : ज्ञान कुमार 
कक्षा : ८
अपना घर 

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

कविता -जब काली घटायें आती हैं

जब काली घटायें आती हैं

जब काली घटायें आती हैं ,
चिड़ियाँ उड़ उड़ जाती हैं .....
घोर घने बादल में जब ,
इन्द्रधनुष चमकते हैं .....
उस समय ऐसा लगता है ,
जैसे कोई बादल गरजता है .....
जब काली घटायें आती हैं ,
बादलों में आक्रति छा जाती हैं .....

लेखक :ज्ञान कुमार
कक्षा :
अपना घर