गुरुवार, 15 सितंबर 2011

चीटीं

चीटीं 

चीटीं होती कितनी हल्की ,
बोझा लेके चलती हिलती-डुलती .....
जाड़े के लिए भोजन करती एकत्र,
 इसलिए वह घूमा करती सवत्र....
देख रही है वह एक दाना ,
जो उसको है अपने बच्चों को खिलाना ...
जाड़े में है वह ठंडी सहती ,
अपनी शरीर की सुरक्षा करती.....
चीटीं होती कितनी हल्की ,
बोझा लेके चलती हिलती-डुलती....

लेखक : ज्ञान कुमार 
कक्षा : ८
अपना घर 

1 टिप्पणी:

"रुनझुन" ने कहा…

सुन्दर रचना!