मंगलवार, 29 अक्तूबर 2019

कविता : खिलता हुआ फूल

" खिलता हुआ फूल "

खिलता हुआ फूल चहकता हुआ लगता है,
हर रंग को बदलकर संवरना अच्छा लगता है | 
खुशबू की महक से मोहित करने वह खाश अंदाज, 
और सजकर गले हर बनना उसे सुहाना लगता है | 
कीचड़ में हो तो भी महकने कोशिश करता है,
वह फूल जो खिलता हुआ मन को मोहित करता है | 
अपने पंखुड़ियों को जब फैलाता है,
आस्मां से आकाश ओर जब झाँकता है | 
हमें लगता वह प्रार्थना कर रहा है, 
की हम खिले रहे मुस्कान से मिले रहे हैं |  

कवि : विक्रम कुमार , कक्षा : 9th , अपना घर

कवि परिचय : यह कविता विक्रम के द्वारा लिखी गई है जो की बिहार के रहने वाले हैं | विक्रम को कवितायेँ लिखने का बहुत शौक है | विक्रम एक नेवी ऑफिसर बनना चाहते हैं | पढ़ लिखकर गरीबों की सहायता करना चाहते हैं | पढ़ने में बहुत होशियार है और समाज के प्रति सोचना बहुत अच्छा लगता है | 

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-10-2019) को     "रोज दीवाली मनाओ, तो कोई बात बने"  (चर्चा अंक- 3504)     पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'