बुधवार, 8 सितंबर 2010

कविता मंगाते हैं अब पैसे

माँगते हैं अब पैसे
ये नेता हो गए हैं कैसा ,
माँगते रहते हैं अब पैसे....
सड़को रोड़ो और चौराहों पर,
पुलिस को भी अब देखो....
कैसे वसूलते हैं पैसे,
ये सब हमने अपने आँखों से हैं देखा.....
ये नेता हो गए हैं अब कैसे,
माँगते रहते हैं अब पैसे....
लेखक ज्ञान कक्षा अपना घर कानपुर

रविवार, 5 सितंबर 2010

कविता रक्षाबंधन

रक्षाबंधन
राखी आयी राखी आयी,
भाई ने बहनों के हाथो से राखी बंधवायी....
राखी नहीं ये हैं रक्षाबंधन,
कभी न टूटे भाई बहन के रिश्तों का बंधन....
रक्षाबंधन का पर्व सभी मानते ,
हिन्दू हो या मुस्लिम सभी इसके गाते गुण....
श्रावण माह की तिथि में इसे मानते,
भाई अपनी बहनों को रक्षा का आशीष देते....
हर पर्व सभी के लिए खुशियाँ लाते,
वह सभी के मन को हर्षाते.....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

शनिवार, 4 सितंबर 2010

कविता कब चेतोगे

कब चेतोगे
एक सज्जन खा रहे थे खाना ,
खाने में था कड़ी और चावल.....
खाते चले जा रहे थे,
कुछ नहीं देख रहे थे....
जो भी आ रहा था,
गिर रहा था उनकी थाली में....
उनको कुछ होश नहीं था,
न ही वो देख रहे थे .....
अचानक एक मक्खी आयी ,
गरदन में उनके घुस गयी.....
झट से उनको पलती हो गयी,
अटक गयी उनके गरदन में मक्खी .....
पहुचे अपने घर के अन्दर,
निकालो जल्दी मेरी गरदन से मक्खी ....
नहीं तो हम मार जायेगे जल्दी....
लेखक अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता कब चेतोगे

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

कविता ब्रहमाण्ड

ब्रहमाण्ड
यह ब्रहमाण्ड हैं कितना अनोखा
इसको गौर से हमने नहीं हैं देखा
कैसा हैं ये ब्रहमाण्ड हमारा
जिसमे छोटा सा हैं संसार हमारा
क्या कही और भी होगा जीवन
क्या वहां पर भी होगा अपना पन
यह तो हैं एक आनोखी कहानी
जो अभी तक हमने नहीं जानी
मै भी जाऊँगा एक दिन चाँद पर
जहाँ पर नहीं हैं हवा पानी और घर
ये अजीब सा ब्रहमाण्ड होगा कैसा
जैसा हमने सोचा क्या होगा वैसा
लेखक धर्मेन्द्र कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

बुधवार, 1 सितंबर 2010

कविता रक्षाबंधन

रक्षाबंधन
रक्षाबन्धन का दिन आया रे ,
बहाने खुशिया खूब मनायेगी....
पापा बाजार जायेगे,
राखी खूब लायेगें ....
रंग बिरंगी राखियाँ हैं,
बहाना सोचे किसको बांधू.....
सबसे पहले भईया को बांधू,
मिठाई उसको खिलाऊगी....
पैसा हम तो पायेगें ,
उस दिन भाई खाते हैं कसम....
हर दम करेगें तुम्हारी रक्षा,
रक्षाबंधन का दिन आया रे....
लेखक जीतेन्द्र कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कविता ये हैं घनघोर आसमान

ये हैं घनघोर आसमान
ये हैं घनघोर आसमान ,
हरदम रहता सीना तान....
लेकर अपनी तलवार और कमान,
हर वक्त करता पानी की बरसात.....
दिन हो या पूर्णा की रात,
पानी की करता हैं बरसात....
ये आसमान नहीं चमन हैं,
यहाँ राजपूतो का अमन हैं....
जहाँ पानी बरसता हैं,
बिजली गरजती हैं....
तब पानी बरसता हैं,
ये हैं घनघोर आसमान....
हरदम रहता सीना तान.....
लेखक मुकेश कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता हर इक गाँव में

हर एक गाँव में
हरे पेड़ की झाँव में,
देश के हर इक गाँव में....
आते लोग जाते लोग,
अपनी गलती पर पछताते लोग....
एक गाँव के छोर से,
मोर के सुन्दर पंखों से....
हंसते गाते चलते मुस्कराते,
सब चलते अपने -अपने रस्ते....
रास्ता कठिन हैं यही बताते,
अपनी मंजिल पाने से डरते.....
अपनी मंजिल वही पाते,
जो कभी विपत्ति से न डरते....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कविता :आसमान में दिखते तारे

आसमान में दिखते तारे

आसमान में दिखते तारे
सुन्दर-सुन्दर कितने प्यारे
तारा जब टिमटिमाते हैं
बच्चे उछल-कूंद मचाते हैं
और जिस दिन तारा दिखता
उस दिन बच्चों का मन भरता
आसमान में दिखते तारे
सुन्दर-सुन्दर कितने प्यारे

लेखक :जीतेन्द्र कुमार
कक्षा :
अपना घर

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कविता धर्म जाति का भेद भुलाए

धर्म जाति का भेद भुलाए
धर्म -धर्म क्यों करते हैं ?
धर्म जाति पर मरते हैं,
धर्म के खातिर मरने वाले ....
इस वतन के हैं जो रखवाले,
धर्म किसी का हिन्दू.....
धर्म किसी का मुस्लिम,
धर्म किसी का सिक्ख....
धर्म किसी का इसाई,
धर्म सभी का अलग -अलग हैं.....
सभी की रंघो में खून तो एक हैं,
हाथ पैर सब कुछ तुम्हारे हैं......
हाथ पैर सब कुछ मेरे भी हैं,
सबके कोई न कोई अपने हैं....
हर एक मानव के भी सपने हैं,
इस सपने को हम कैसे पाये....
आओं हम सब आपस में मिल जाये ,
धर्म जाति का भेद भुलाए.....
आपस में एक का मेल बढाए.....
लेखक आशीष कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता सोच के बताइए मैं कौन हूँ

सोच के बताइए मैं कौन हूँ
मुझे लगता हैं की मैं एक गुलाम हूँ ,
क्या मैं दूसरे का दास हूँ.....
क्या आप बता सकते हैं,
मेरे सवालों का जवाब दे सकते हैं....
मै सोच सकता हूँ,
देख सकता हूँ.....
सुन सकता हूँ,
मै आप के विचार नहीं बदल सकता हूँ.....
देखने में आप मुझे भोले लगते हैं,
मुझे क्या पता आप क्या सोच रहे हैं.....
चलो जरा आगे बढते हैं,
सोच के आप मुझे बताइए.....
क्या मैं दास हूँ या गुलाम हूँ,
विचार कर के बताइये जरा आप मुझे .....
आखिर मैं कौन हूँ .....
लेखक अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर