बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

कविता :सूरज मामा चन्दा मामा

सूरज मामा चन्दा मामा

कलम और कॉपी लेकर ।
बैठे जब हम टेबल पर ॥
आसमान की ओर देखा जब ।
कितने तारे चमक रहे थे तब ॥
चन्दा मामा घूम रहे थे ।
अर्धवृत्त आकृति लिए हुये थे ॥
चल रहे थे अपने पथ में ।
मगन हुए थे अपनी धुन में ॥
गयी रात जब हुआ सबेरा ।
पंछी गाया तब मुर्गा बोला ॥
सूरज मामा लेकर आये ।
साथ में अपने लाल घटाए ॥
गुम हो गए चन्दा मामा ।
लाल हो गये सूरज मामा ॥
चन्दा मामा कहीं सो गये ।
शायद सपनों में खो गए ॥
चन्दा मामा सूरज मामा ।
दुनियाँ घूमें आधा-आधा ॥
सूरज मामा जब-जब जागे ।
सारी दुनियाँ तब-तब भागे ॥

लेख़क :अशोक कुमार ,कक्षा :
अपना घर

5 टिप्‍पणियां:

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत बढ़िया ,बधाई !

NEHA MATHEWS ने कहा…

बहुत अच्छी कविता|

चैतन्य शर्मा ने कहा…

अच्छी लगी कविता...

कविता रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता

Aditya farkiya ने कहा…

Bahut badhiya lagi hah kavita,,,,,,,