सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

कविता :बन्दर बड़े जोर से बमका

बन्दर बड़े जोर से बमका

एक मदारी खेल दिखाता ,
बन्दर और बंदरिया को नचाता ....
बंदरिया लगाती ठुमके जितने ,
मदारी को मिलते पैसे उतने ....
बंदरिया ने लगाया जब ठुमका ,
तब बन्दर बड़े जोर से बमका ....
कभी लेटकर नाचे तो कभी उठकर ,
गुस्सा बैठा था उसकी नाक पर ....
बन्दर येसा नाच दिखाया ,
की लोगों ने पैसों का ढेर लगाया ....
मदारी के गालों में दो-चार थप्पड़ मार ,
बन्दर और बंदरिया दोनों हो गये फरार ....

लेख़क :आशीष कुमार ,कक्षा :
अपना घर

7 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत प्यारी और मजेदार कविता....

mrityunjay kumar rai ने कहा…

सुंदर

device independent mobility ने कहा…

Crazy poetry i ever read.

Rajnish tripathi ने कहा…

हां..हां... हां.. भई मज़ा आ गया इस कविता को पढ़ कर।कविता ने तो बचपन को याद दिला दिया। एक बचपन की कविता की कुछ लाइने याद आ गयी...
राजू राधा दो बच्चे थे रोज संजाए अपना घर ...भई मज़ा आ गया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत-बहुत बधाई!
--
सुन्दर बाल कविता है!
--
आपकी चर्चा तो हमने
बाल चर्चा मंच पर भी कर दी है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/10/25.html

रानीविशाल ने कहा…

हा हा हा ....बहुत मज़ेदार
अनुष्का

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत प्यारी कविता।