सोमवार, 14 जून 2010

कविता :एक मकान में चार दुकान

एक मकान में चार दुकान

एक मकान में चार दुकान ।
बनते थे सब में पकवान ॥
चारो दुकानों में थे मोटे हलवाई ।
करते-रहते थे दिन-रात लड़ाई ॥
लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे ।
दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥
चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश ।
उस दिन चारो हलवाई नहीं करते थे बकवाश ॥
एक मकान में चार दुकान ।
बनते थे सब में पकवान ॥
लेखक :ज्ञान कुमार
कक्षा :
अपना घर

2 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

एक मकान में चार दुकान ।
बनते थे सब में पकवान

" वाह हलवाई की दूकान का नाम सुनते ही पकवान की खुशबु आने लगी हा हा हा
"
"lov" and "luck"

माधव ने कहा…

vah vah vah vah