गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

लेख:- शिक्षा से बनती समझ

शिक्षा से बनती समझ
अपना घर में रहने वाले बच्चे आजकल स्कूल से छुट्टी होने के कारण कुछ दिनों के लिए ईट - भठ्ठो में रह रहे अपने परिवार के पास गए है ताकि वे उनकी कामो में मदद कर सके। आज मै तातियागंज भठ्ठा गया उनमें से २ बच्चों ज्ञान और लवकुश से मिलने के लिए.......... लवकुश के परिवार वाले इस साल भठ्ठो पर काम करने नही आए है इसलिए लवकुश ज्ञान के परिवार के साथ रहकर ईट पथाई में उनकी मदद कर रहा है। जब मै भठ्ठे पर पंहुचा करीब १२ बज रहे थे..... आज धूप की तपिश बदन को झुलसा रही थी... और धूल भरी गर्म हवा के थपेड़े लगातार चेहरे पर अपने होने का एहसास करा जा रहे थे .... सामने लवकुश और ज्ञान मिटटी की गुथाई में लगे हुए थे ( ईट की पथाई के पहले मिट्टी की गुथाई की जाती है) मै उनके बीच पहुच गया। सभी से दुआ सलाम हुई उसके बाद सबसे बातचीत होने लगी ज्ञान के परिवार के सभी लोग आकर आसपास में बैठ गए। बातचीत में लवकुश ने अपने घर वालो से बात करने की इच्छा जताई। मैंने लवकुश से उसके गाँव का फोन न० लिया और अपने मोबाईल से डायल किया... लवकुश की उम्र करीब ११ साल की है कक्षा ५ में पढ़ाई कर रहा है... लवकुश का गाँव दुधिया टांड बिहार और झारखण्ड के सीमा पर बिहार के नेवादा जिले में है । इसी गाँव से झारखण्ड का कोडरमा जिला शुरू हो जाता है। दुधिया टांड पहाड़ के आँचल में बसा एक छोटा सा गाँव है....... ऊँचे - ऊँचे ताड़ के पेडों के बीच और पास के झरने से बह के आती छोटी सी नदी के धारा इस गाँव को और सुंदर बनाती है। काफी देर बाद मोबाइल कोई उठाता है किससे बात करनी है की आवाज आती है... मै मोबाइल लवकुश को दे देता हूँ... लवकुश अपने बारे में बताता है और कहता है घर पे बात करनी है । ५ मिनट बाद बात करने को कहता है। ५ मिनट बाद लवकुश फोन करता है फ़ोन उसकी माँ उठाती है... बातचीत शुरू हो जाती हो जाती है...(उनकी बातचीत अपनी भाषा में होती है मै उसका अनुवाद लिख रह हूँ )
माँ ..पूछती है क्या हाल है
लवकुश... सब ठीक है मै अच्छे से पढ़ाई कर रह हूँ
लवकुश... घर में सब ठीक है ? पिता जी कंहा है ?
माँ.... पिता जी ताड़ी पीने गए है.. और सब घर में ठीक है
लवकुश.... पिता जी को मना क्यो नही करती हो की ताड़ी मत पिया करे नही तो तबियत ख़राब हो जायेगी.... ताड़ी पीना ठीक नही है ये तो नशा है पिता जी को समझाना की ताड़ी ना पिया करे... बोलना की लवकुश ने पीने को मना किया है...
माँ... मना करुँगी औए कह भी दूंगी और बताओ तुम्हारी तबियत ठीक है न खाना पीना सब ठीक है ना
लवकुश... माँ तबियत ठीक है खाना - पीना भी सब ठीक है ... काजल और राहुल ((बहन और भाई ) की पढ़ाई कैसी चल रही है।
माँ.... काजल तो पढ़ने जा रही है राहुल नही जा रहा है दिनभर खेलता है अभी भी खेलने गया हुआ है...
लवकुश
... राहुल को समझाओ की पढ़ने जाए पढ़ना बहुत जरूरी है मै भी जब गाँव आऊंगा तो उसे समझाऊंगा... काजल को बराबर स्कूल भेजते रहना... और माँ गाँव, पड़ोसी और मेरे दोस्तों का क्या हालचाल है...
माँ .... गाँव में सब ठीक है तुम्हारे चाचा की लड़की रेखा की शादी होने वाली है इस माह में और पार्वती की भी शादी हो गई ....
लवकुश... क्या माँ रेखा की शादी हो रही है वो तो बस १२ साल की है इतनी छोटी है और शादी हो रही है तुमने रोका क्यो नही शादी करने से छोटे में शादी करना ग़लत है तुम्हे इस शादी को रोकना चाहिए था....
माँ.... खिलखिला कर हँसती है और कहती है वो छोटी कंहा है १२ साल की है तुमको तो पता है यंहा गाँव में छोटे में शादी हो जाती है ... तुम इतने बड़े हो गए हो की ये सब सोचो...
लवकुश... दुखी होकर मेरी तरफ़ देखता है और कहता है भइया वो अभी १२ साल की है और ये लोग उसकी शादी कर रहे है वो माँ से थोड़ा गुस्से में बोलता है आप लोगो को समझ में नही आता है की छोटे में शादी नही करना चाहिए उससे उसको कितना नुकसान होगा उसको अभी पढ़ना चाहिए था १८ साल के बाद शादी करना चाहिए था... आप लोगो ने ग़लत किया है... काजल को आप लोग पढ़ाई करा कर १८ साल के बाद शादी करियेगा... आपको गाँव में समझाना चाहिए की छोटे उम्र में किसी की शादी ना करे... हम भी जब गाँव आयेंगे तो लोगो को समझायेंगे...
फ़िर लवकुश अपने बुआ, दादी और गाँव के लोगो से बात करता है......
इस बात को सुन कर आज उन चर्चाओ का परिणाम समझ में आता है जो हम लोगो ने अपना घर में इन तीन वर्षो के दौरान की है अलग -अलग सामाजिक बुराइयों और अन्य मुद्दों पर ... साथ ही किस तरह से उन चर्चाओ से एक छोटे से बच्चे की पूरी सोच और समझ विकसित हो रहा है ये भी देखने को मिला ... शिक्षा का सही अर्थो में शायद यही मतलब होता है.... जो इन्सान को सही दिशा में ले जाए.... आज लवकुश को देखकर लगा की शायद हम सही दिशा में है और अंततः शायद इन बच्चों की मदद से हम एक बेहतर समाज बनाने की कल्पना को साकार कर पाए.... बच्चो की इस ब्लॉग पर आज मै अपने को लिखने से नही रोक पाया इस के लिए माफ़ी चाहूँगा...
महेश, अपना घर, कानपुर





मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

कविता:- नेता जी का मुंह में मच्छर

नेता जी के मुंह में मच्छर
आज सुनी मैंने गजब ख़बर।
नेता के मुंह में अटक गया मच्छर॥
नेता जी भागे खांसते - खांसते।
दौड़े पतली गली के रस्ते॥
पहुँच गए डाक्टर घसीटे के पास।
उसने सोचा दिन है मेरा खास॥
तभी नेता जी टप से तब बोले
जल्दी से अपना मुंह खोले॥
मुंह के अन्दर मेरे मच्छर।
फंस गया है वो उसके अन्दर॥
पकड़ा डाक्टर ने चिमटे से मच्छर।
जोर लगाया उसने कसकर॥
निकल गया फ़िर गले से मच्छर।
फ़िर भी मच्छर रहा सिकंदर॥
डंक टूट गया गले के अन्दर
नेता जी फ़िर बन गए बन्दर॥
खांस - खांस कर हुए बेहाल।
याद आया उनको ननिहाल॥
आदित्य पाण्डेय , अपना घर, कक्षा ६



शनिवार, 18 अप्रैल 2009

कविता:- हमारा अख़बार


हमारा अखबार
कितना अच्छा है, अखबार हमारा,
दुनिया भर की बातें भर लाया।
सुबह आता है जब अखबार,
पढ़ते हैं दुनिया की खबरे भरमार।
हिन्दुस्तान है अखबार हमारा,
हमको लगता है सबसे प्यारा।
सबसे अच्छा सबसे न्यारा,
हिन्दुस्तान अखबार हमारा।
इधर उधर की खबरे लाता,
यूं ही सबका मन बहलाता।
हिन्दुस्तान अखबार हमारा,
सबसे अच्छा सबसे न्यारा।
अक्षय कुमार, कक्षा 6
अपना घर,
बी-135/8, प्रधान गेट, नानकारी,
आई0आई0टी0, कानपुर-16

कहानी:- मेहनत का फल

मेहनत का फल
एक बार की बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था ।वह बड़ा दयालु किस्म का आदमी था वह रोज जंगल में जाता और लकड़ी काटकर लाता और उससे जो बीस पच्चीस रूपये मिल जाते उसी से अपना गुजर बसर करता वह किसान के पास एक विस्वा खेत था वह बेचारा इतना गरीब था कि वह अपना चप्पल जूता भी नही खरीद सकता फिर वह उसके पास थोड़ी बहुत जमीन थी वह भी बंजर पड़ी थी । बंजर के कारण उसके खेत खेलिहान सब सूख गये थे। उसके पास पानी का कोई साधन नही था तो बेचारा वह क्या करता। उसके पास टूटी -फूटी झोपड़ी थी वह उसी में रहता था। एक दिन वह फिर जंगल में गया और उसने कडी़ मेहनत करके लकड़ी काट कर लाया, फ़िर वह बाजार गया और उसने दस हजार की लकड़ी बेच दी फिर उसने दो बैल और दो गाय खरीदी सात हजार रूपये की और खुद के लिए १००० रुपये के बढ़िया कपड़े लाया, और अपने गाय बैलों के लिये भूसा चारा आदि के लिये २००० रुपये रख लिए। वह खुशी से रहने लगा, तभी एक दिन बहुत जोर बारिश हुई, बारिश के कारण नदी, तालाब, खेत खलिहान सब भर गये, अब किसान को बहुत प्रशन्नता हुई। वह बैलों को लेकर अपना थोड़ी बहुत जो खेती थी उसे जोतने लगा, फिर अब उसके पास धन नही था, फिर वह लकड़ी काटने गया। उससे जो पैसा मिला उससे वह अपने खेत के लिये बीज ले आया, फिर वह उसे बो दिया और उसके पास जो गाय थी, वह उसको चारा खिलाता कुछ दिन बाद गाय को एक बछड़ा पैदा हुआ, और अब वह दूध बेचने लगा, फिर उसने सोंचा कि गांव में कोई दूध नही लेगा, और उसने सोचा दूध को कैसे बेचा जाये, उसके पास साइकिल तो नही थी। उसने गेहूं को काटा और उसे पछोर कर बाजार में बेचने चला गया, और उसे बेचकर अपने लिये एक साईकिल लाया। अब वह रोज शहर मे जाकर दूध बेचने लगा, दूध बेचने पर उसे ढेर सारे पैसे मिले, उस पैसों से उसने अपनी टूटी फूटी झोपड़ी बनवा ली। अब वह सुख व शांति पूर्वक रहने लगा। इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है की इस दुनिया मे जो मनुष्य मेहनत करता है वही सफल होता है।
आदित्य कुमार, कक्षा 6
अपना घर,
बी-135/8, प्रधान गेट, नानकारी,
आई0आई0टी0, कानपुर-16

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

कहानी:- चींटी की मेहनत


चीटीं की मेहनत
एक बार बहुत तेज बारिस हो रही थी। जंगल के सभी जीव-जन्तु पक्षी भीग रहे थे। बहुत ज्यादा बारिश होने के कारण वह ठण्ड से कांप रहे थे। जंगल में चारो तरफ पानी ही पानी भरा था। हाथी सोचने लगे कि कितनी जल्दी धूप निकले तो अच्छा हो फिर थोड़ी देर बाद सूरज निकला और धूप चारो ओर तरफ फ़ैल गई । सभी हाथी छाया छोड़ कर धूप में आने लगे, बदन सूखने के बाद धीरे-धीरे सभी हाथी धूप से हटने लगे और इधर-उधर टहलने लगे। कुछ देर के बाद फिर जोर से बारिस होने लगी। इतनी तेज बारिस हुई कि सभी हाथी बहने लगे। एक चींटी पेड़ पर बैठी हाथी का बहना देख रही थी। हाथी ने चींटी से कहा मुझे बचा लो। चींटी ने कहा कि चिंता मत करो मै तुम्हें बचाने आ रही हूँ । यह कहकर चींटी पेड़ से कूद गयी और पानी में बहने लगी बहते-बहते वो हाथी के पास पहुंच गयी। थोड़ी देर बाद बारिस के रूकते ही पानी घट गया और हाथियों का बहना बन्द हो गया। सभी हाथी डूबने से बच गये, थोड़ी देर बाद चींटी ने हाथियों से कहा देखा मैंने तुम लोगों को कितनी मेहनत से बचाया है। यह सब सुनकर सभी हाथी जोर-जोर से हंसने लगे।
कहानी:- आदित्य कुमार, अपना घर, कक्षा ६
पेंटिंग:- मानस कुमार, अपना घर, कक्षा 6

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

कविता:- मेरी कहानी और मेरी परेशानी


मेरी कहानी और मेरी परेशानी
एक बार की एक कहानी।
कहती है यह मेरी नानी॥
पापा कहते हैं लाओ पानी।
मम्मी कहती हैं सुन मेरी बानी।।
भईया कहते बाहर न जाओ।
दीदी कहती यहाँ पर आओ।।
साथ मे खेलो साथ मे खाओ।
साथ ही रहकर गाना गाओ।।
यही सभी मिलके कहते है।
मेरी नहीं कोई सुनते है।।
क्या करू मै सुनकर बानी।
कैसे दूर करु अपनी परेशानी।।

आदित्य कुमार, कक्षा 6
अपनाघर, बी-135/8,प्रधान गेट, नानकारी,
आई0आई0टी0, कानपुर-16

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

कविता:- आम


आम

बात है बहुत पुरानी।
सुनो तो आएगा मुँह में पानी।।
पेड़ों में आम लगे थे।
हम उसके नीचे खड़े थे॥
इतने में हवा का झोंका आया।
आम टप से नीचे आया॥
मैंने झट से उसको पाया।
मुँह में मेरे पानी आया॥
धोकर मैंने उसको खाया।
खाने में बड़ा मजा आया॥
अशोक कुमार
अपना घर, कक्षा 6

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

कहानी:- थरंगा और पतरंगा


थरंगा और पतरंगा
एक बार की बात है । एक जंगल में एक भालू रहता था। जंगल में वह मस्ती से रहता था, ढेर सारे फल और शहद खाकर, आराम से पेड़ के नीचे सोता था। जंगल के सभी जानवर उसे थरंगा कहकर बुलाते थे। थरंगा अपना नाम बुलाने पर बहुँत खुश होता था। पेड़ के नीचे बैठकर वो कहानी और कविता लिखता था। धीरे - धीरे वो जंगल का बहुँत बडा लेखक बन गया। उसने एक कविता लिखी.....
भालू हूँ मै भालू हूँ।
खाता सौ ग्राम आलू हूँ
उसी जंगल में एक खरगोश रहता था। वो दिन भर गाजर खाता और जंगल में जगह - जगह पेंटिंग करता। उसके पेंटिंग जंगल में जगह - जगह बहुत सुंदर दिखाई देते थे। जंगल के सभी उसे प्यार से पतरंगा कहकर बुलाते थे। पेडों पर पर वो घूम - घूम कर मौज करता था। एक दिन थरंगा और पतरंगा दोनों आपस में मिल गए। थरंगा कहानी लिखता और पतरंगा उसमे पेंटिंग बनाकर लगा देता। थरंगा और पतरंगा दोनों मिलकर जंगल में सभी
जानवरों के साथ बड़े मजे से रहने लगे।
कहानी:- स्टुवर्ट, अपना घर, कक्षा ७
पेंटिंग:- जितेंद्र कुमार, कक्षा ६

कहानी :- बूढे की विरासत

बूढे की विरासत
एक बार की बात है, जंगल में एक व्यक्ति रहता था, जो अत्यन्त निर्धन था। उसके पास केवल दो आम और दो अमरूद के पेड़ थे। उन पेड़ों के फलो को बेचकर वो अपना गुजर - बसर करता था। इस तरह करते हुए कई साल गुजर गए और वह अब काफी बूढा हो चला था। उसके कामों में पास के ही गाँव का एक लड़का मदद कर देता था। उसके बदले वह बूढा ब्यक्ति उसे ढेर सरे फल खाने को देता था। उसके आम और अमरूद के पेड़ों में इस साल खूब सारे फल लद गए थे। बूढा किसान सोचने लगा की मै पता नही कब इस दुनिया से चला जाऊ, मेरे बाद इन पेड़ों को कौन देख - भाल करेगा। यही सोचते हुए उसने उस लड़के को बुलाया और उसे अपने पेडो को सौंप कर अपना दम तोड़ दिया। उस लड़के ने उन पेड़ों की खूब सेवा की उन्हें पानी और खाद दिया, पेड़ खूब हरे - भरे हो गए। हर साल पहले से ज्यादा फल पेड़ों पर आने लगे, उन फलों को बेचकर वो लड़का धीरे - धीरे काफी अमीर हो गया। उसने ढेर सारे पेड़ लगाये और सारी दुनिया हरी- भरी हो गई......
मुकेश कुमार, अपना घर, कक्षा 7

रविवार, 12 अप्रैल 2009

ब्यंग:- गाँधी जी के नक्शे कदम पर

गाँधी जी के नक्शे कदम पर....
अध्यापक ने छात्रों से पूछा....... ? हमारा देश गाँधी जी के नक्शे कदम पर चल रहा है इसका उदहारण दो......
एक छात्र ने अपनी जगह से खड़े होकर तपाक से जबाब देते हुए कहा कि ... गाँधी जी ने कहा था कि .... दुनिया में आप हर एक से कुछ न कुछ ले सकते है ..... इसलिए आज हमारे देश के नेता जो देश को चला रहे है.... गाँधी जी के नक्शे कदम पर चलते हुए विदेशियों से कर्ज, धनियों से चंदा और निर्धनों से वोट लेते रहे है और ले रहे है........
राम सिंह , कक्षा 5

कविता:- बसंत का महीना

बसन्त का महीना
बसन्त का महीना कितना सुहाना।
लगे सभी के मन को सुहाना॥
बाग - बगीचों में हरियाली।
खेतों में छाई हरियाली॥
क्यारी के किनारे फूल है॥
नीले - पीले, गुलाबी लाल है।
फूलों के ऊपर तितली है॥
कितनी सुंदर लगती है।
जब तितली आसमान में उड़ती है।
बिल्कुल परियों जैसी लगती है॥
उनको देख के ऐसा लगता।
काश की हम तितली बन जायें॥
उनके संग हम खेल - खेल में।
आसमान में उड़ते जाए ॥
बसंत का महीना कितना सुहाना।
लगे सभी के मन को सुहाना॥

आदित्य तिवारी, अपना घर, कक्षा ६