शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कविता - मुकाम पा लिया

 मुकाम पा लिया 

भोर का समय था ,
मैं  जा रहा था राहों से .....
सून- सान थी सारी जगह ,
मैं डर रहा था तम के गर्दिश में .....
सहसा चली पवन तीव्रता से ,
भागे काले मेघ डरकर ....
खिल उठा रवि हंसकर ,
मन से निकला मेरे डर .....
पवन थी इतनी ठंडी ,
ताजगी भर गयी मेरे जीहान में ....
आगे बढ़ा तो एक तितली आयी ,
आ बैठी मेरे हाथ में ......
कितने वर्णों की थी ,
की मैं  कुछ कह नहीं सकता .....
 देख - देख मैं खूब हंसता ,
उसकी सुन्दरता के बारे में सबसे कहता .....
जिस कार्य से निकला था ,
वह कार्य मैं तो भूल गया .....
आ गयी मेरी मंजिल ,
मैने अपना मुकाम पा लिया ...

                                                             लेखक -आशीष कुमार
                                                             कक्षा -१०
                                                             अपना घर  

कविता - क्यों नहीं याद

 क्यों नहीं याद 

वो भगत का शहीद खून ,
वो जवानी झांसी की रानी की  ........
जो झकझोर दिया था ,
उन गोरे अंग्रेजों को ......
लेकिन आज के इस भ्रस्ट समाज में,
भ्रस्टाचारियों की है भरमार ......
इन  भ्रस्टाचारियों से ही ,
चल रही है हमारी ......
मिली जुली सरकार ,
आज के इस  भ्रस्ट समाज में ......
रह - रहे हैं सभी एक साथ ,
अपने हक़ को मांगने के लिए .....
आगे बढ़ नहीं रहे कभी ,
क्यों हम किसी का जुल्म सहें ?
क्यों न हम अपना हक़ लेकर रहें?

                                                          लेखक -ज्ञान कुमार
                                                          कक्षा -९
                                                          अपना घर 

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कविता - मेरा गाँव

              कविता

 मेरे गाँव की सुनों कहानी ......
लाइट के प्रति हो रही मनमानी,
कभी रात में लाईट आती है ....
तो कभी हमेशा के लिए जाती है,
विधुत व्यवस्था  है बड़ी ख़राब .....
इस पर चलता है केस्को का राज,
विधुत से गाव के लोग परेशान ......
इसीलिये नहीं है गाँव की शान ,

                                        लेखक -मुकेश कुमार
                                         कक्षा -  १ १ 

शनिवार, 16 मार्च 2013

               कविता 

इंसान के लिए हमदर्दी नहीं पत्थर दिल इंसान में ,
 से मरते हैं लोग इस जहांन में .......
दुनिया को देखिये चाँद तक पहुंच गयी ,
ईश्वर पर अब भी विश्वास करते हन्दुस्तान में .....
पड़ोसी चाहे भूंख से तडपता रहे लेकिन ,
फल,दूध आदि पहुचाते हैं ईश्वर के मकान में .....
ईश्वर तो लोगों के दिलों में बसे हैं, 
क्यों ढूढ़ते हो पत्थर की मूर्ति और आसमान में ?
भुखमरी हटाने का वादा तो करते हैं ये नेता ,
लेकिन ताकत नहीं उनके जिस्मों जान में  .....


                                              लेखक : धर्मेन्द्र कुमार 
                                              कक्षा :९ 
                                              अपना घर 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

    कविता

रोड और क्रासिग पर ,
गाडी और मोटर कारों की.......
लगी रहती है कतार ,
ट्रैफिक पुलिस की बात निराली .......
करते हैं अपनी मनमानी ,
लगे रहते हैं लोडर ट्रकों से .......
रुपयों की वशूली करने ,
ट्रैफिक नियमों का ......
पालन नहीं कराते ,
लोडर ट्रक वालों को है गरियाते.......


             लेखक : जीतेन्द्र कुमार
             कक्षा : ९
             अपना घर 

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बुधवार, 13 मार्च 2013

कविता : मंहगाई

"मंहगाई"

मंहगाई ने आसमान छू डाला ,
गरीबों को तो भूखा मार डाला .....
सब्जी मंहगी, अनाज मंहगा,
अब तो हर सामान है  मंहगा .....
पेट्रोल तो इतना मंहगा हो गया,
गाड़ियों में पेट्रोल डलवाना .....
कितना ज्यादा मंहगा पड गया ,
नया नेता बनाने से ......
कुछ बदलाव नहीं आया ,
सभी चीजों को मंहगाई ने है खाया ......

नाम : चन्दन कुमार, कक्षा : ७, अपना घर 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

शीर्षक : ठंडी

              "ठंडी"
इस बार ठण्ड का आया मौसम ।
जिससे की सारा शहर गया सहम ।।
तूने न पहचान ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में बोले हर -हर गंगे हम ।।
सूरज न दिखता , ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में कोहरे का कोहराम ।।
सुन लो बच्चो सुन लो तुम ।
छुट्टी में कर लो आराम ।
इतना भी न करना आराम ।।
कि कोई न दे तुमको काम ।
कुछ काम करो और हो जाओ लायक ।
जिससे न कहा पाए कोई मक्कार , निक्कमा ,नालायक !
नाम : आशीष कुमार, कक्षा 10, अपना घर, कानपुर  

शीर्षक : स्त्री

            " स्त्री "
एक स्त्री जिसने समाज को बनाया ,
आज उस स्त्री को महत्व ,
लोगों की समझ से परे है ,
क्योंकि लोगों नहीं समझ रहें सामाजिक तत्व ,
की स्त्री वाही नारी है ,
जिसकी गोद मे खेली दुनिया सारी ,
आखिर कब तक सहे वह जुल्म ,
मानव कर रहा दिन प्रति -दिन जुर्म ,
तुम्हे है इतनी बेशर्मी ,
फिर भी बैक स्त्री को ही कहते मम्मी ,
तुम्हारे घर में भी है माँ - बहन ;
यदि उनका करे कोई बलात्कार और लुटे गहने ,
फिर बोल क्या करोगे ?
क्या  इसी तरह के स्त्री पर हो रहे जुलम सहोगे ,
क़ानून तो केवल है अँधा ,
केस मुकदमे चलाना यह है एक धंधा ,
देश मे इतने सारे है क़ानून ,
पानी के भाव बह रहा है खून ,
इतनी है सुरक्षा और  सैन्य बल ,
जिससे हर समस्या हो सकती है हल ,
इस देश की व्यवस्था को चलाने वाले ,
कर दो इन सब के मुंह काले ,
धन -दौलत के चक्कर में हो गए है अंधे ,
लूटमार , बलात्कार ,करना हो गए है रोज के धंधा ,
लक्ष्मी बाई और दुर्गावती के जैसे ,
यदि बन जाए हर स्त्री वैसे ,
तो इस देश से कतम हों जायेंगे जुल्म साते ,
फिर ना बच पायें लूटमार बलात्कार के हत्यारे ,
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा : 10
अपनाघर कानपुर 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

 शीर्षक :- आज की फिल्मे
आज की फिल्मे तो आदर्श बनी पड़ी है....
युवा पीढी को भड़काने में |
ऐसे अश्लील से शब्द है....
हर किसी न किसी फ़िल्मी गानों में |
वर्तमान में फिल्मो का ऐसा पड़ा है, सब पर असर....
कि चारो ओर चल रहा है, फिल्मो का ही कहर |
मुन्नी से लेकर शीला की जवानी....
हर बच्चे की जुवां पर है, अजब प्रेम की गजब कहानी |
डायेरेक्टर भी तो कहते है, क़ि लोंगो की जैसी मांग....
वैसी हम करेंगे उनकी पूर्ति |
दुकानदार का कम है, बीडी तम्बाकू को बेचना....
तो तुम अपने आप को रोको मत खाओ सुरती |
मां बाप मना करें तो नहीं मानते बच्चे....
बातें कहेंगे ऐसी जैसे वह सबके चच्चे |
शौक है उनका फिल्म मोबाईल रख गाड़ी से चलना....
और रातों दिन है, मोबाईल से बातें करना |
कवि :- आशीष कुमार
कक्षा :-10
अपना घर 


शनिवार, 26 जनवरी 2013

शीर्षक : दामिनी की आवाज

  '' दामिनी  की  आवाज ''
मरी नहीं मैं जिन्द्दा हूँ ।
सफेद रंग का परिन्द्दा हूँ ।।
नाम  नहीं कोई मेरा ।
न नाम मेरा तुम जानो ।।
मेरी धड़कन को सुन लो ।
मेरी आवाज को पहचानो ।। 
इंसाफ चाहिए मुझको ।
जो तुम ही दिल सकते हो ।।
मैं सो गई तो क्या हुआ ।
तुम तो देश को जगा  सकते हो ।।
दामिनी नाम रखकर ,
इस देश मे बनी मेरी पहचान ।
मई नहीं चाहती की के साथ हो ।।
जैसा मेरा हुआ अंजाम ।
 मरी नहीं मैं जिन्द्दा हूँ ।
 सफेद रंग का परिन्द्दा हूँ ।।
नाम : रितिक चंदेल 
उन्नाव  

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

शीर्षक : बच्ची

         ''बच्ची ''
वह ममता  की कोमल ,  
कमल की चमेली , +
माता ,पिता की ,
वह अकेली ।
वन सुन्दर एक राजकुमारी थी ।।
वह सरजमी की  ममता ,
वह अनंत की  झोली ।
वह हिम जैसी सफेदी ,
वह सरिता झरना की उद्गम झोली ।
वह सुन्दर एक राजकुमारी थी ।।
वह बड़े जोर से हँसती थी ।
वह सारे सरगम गा चुकी थी ,
वह दिनकर का उद्गम खोल चुकी थी ।
 वह ममता  की कोमल ,
कमल की चमेली ,
माता ,पिता की ,
वह अकेली ।
वह सुन्दर एक राजकुमारी थी ।।            
 नाम :अशोक कुमार 
कक्षा : 10
अपना घर ,कानपुर