बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

कविता: "कठिन परिश्रम"

"कठिन परिश्रम"
पड़ने लगे हाथो में छाले इनके। 
 हाथो की रेखाए भी मिटने लगे ।।
काम इतना करते है, की अब काम भी इनसे डरने लगे है ।
पसीना से नहा लेते है यह, न ही कूलर नसीब हुए ।।
गर्मी बरसात या हो सर्दी, अब ये भी सब भी दलने लगे ।
सूरज की धुप इतना सहते है की सूरज भी इनसे डरने लगे है ।।
फसल तो बो दिए अब इनसे, पर डर है कही ख़राब न हो जाए ।
सुबह से लेकर अब शाम तक निगरानी करने लगे है ।।
फसल कही खराब न हो जाये, अब ये जगने लगे है ।
बीसो साल लगा के अब पहाड़ भी काटने लगे ।।
हिम्मत तो बहुत है इसमें अब पर्वत भी इनसे डरने लगे। 
मजदूर है हम, मजदूरी में हम मरने लगे है ।।
कवि: सुल्तान, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

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