शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

कविता: "बच्चे काम जा रहे है"

"बच्चे काम जा रहे है" 
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये। 
वही मैले कपड़े पहने रहते है ।। 
काम करने पर कुछ खाने को दे देते है । 
दिन भर मेहनत करा के शाम को छुटी कर देते है ।। 
एक बार उनके हाथो को देखो तो, उनकी लकीरे शायद ही हो,
उनसे पूछो तो उनके दिल में किस चीज की चाह है ।। 
कभी स्कूल के लिए पूछो । 
शायद एक उगता सूरज बन सकता हो।। 
अंधेरो मार भगा सकता हो । 
एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।  
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।  
 बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।। 
 कवि: नरेंद्र कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कोई टिप्पणी नहीं: