"अँधेरी रात हो रही है"
अँधेरी रात हो रही है।
न जुगनू है न तारे है आसमा में ।।
ऐसा क्यों लगता है की चाँद का मुखड़ा नराज़ सा है ?
सब तरफ सन्नाटा और दर्द से भरे हुए है ।
आशा की उम्मीद मानो जैसे बस कम हो।।
मन चाहत की कब सवेरा हो ।
सूरज की किरणे एक बार फिर आसमा का हो ।।
आते रहते है इन्सेक्ट की आवाजे ।
बड़े ही खतरनाक लगता है सुनने में ।।
दर का माहौल बना देता है रातो में ।
अँधेरी रात हो रही है ।।
न जुगनू है न तारे है ।
दूर - दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता है ।।
काली परछाई का राज चलता हो ।
हर रात बस उनका हो ।।
कब एक बार फिर से सूरज आसमा में होगा ।
आशा की उम्मीद अपना होगा।।
चमकता सूरज हमारा हो ।
कवि: निरंजन कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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