"क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है"
लिख दूँ तो क्या समझ लोगे।
बोलूँ अगर तो क्या सुन लोगे ।।
बनाए उनके रास्ते से तो गुजरेंगे ।
पर मेहनत की अहमियत नहीं समझेंगे ।।
हर मज़दूर खुद से यह सवाल पूछता है ।
क्यों खुद अमीर - गरीब में फर्क रखता है ।।
इमारते ईटो और पत्थरो से सजाता है ।
हर खतरा सहकर एक महल खड़ा करता है ।।
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है ।
टूटती उम्मीद और बिखरता साहस ।।
ये सारी खामियाँ लेकर चलता है ।
गुजरा कल और आता भविष्य, भूल जाता है ।।
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है ।
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है ।।
उनकी बनाए हुए माकन पर हम रहते है ।
आते - जाते रास्ते में एक नहीं हजार बार मिलते है ।।
पर कोई उनका इज्ज़त नहीं करना जनता है ।
न जाने क्यों इमारते ईटो और पत्थरो से एक मज़दूर ही क्यों सजता है ।।
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है ।
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है ।।
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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